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Friday, June 7, 2019

Social science chapter-2

2.इंडो चीन का राष्ट्रवाद

इस अध्याय की मुख्य बातें:

  • इंडो चीन का अर्थ
  • वियतनाम में उपनिवेश की शुरुआत
  • फ्रांसीसी शासकों द्वारा शिक्षा और अर्थव्यवस्था में बदलाव
  • धार्मिक विद्रोह
  • कम्युनिष्ट पार्टी की स्थापना
  • वियतनाम का विभाजन
  • अमेरिकी कब्जा
  • वियतनाम की स्वतंत्रता
शुरुआती इतिहास: आधुनिक वियतनाम, लाओस और कम्बोडिया के इलाकों को इंडो चीन कहा जाता है। प्राचीन काल में यहाँ के लोग अलग-अलग समूहों में बँटे हुए थे और चीन के शक्तिशाली साम्राज्य की छत्रछाया में रहते थे। जब स्वतंत्र राष्ट्रों का निर्माण हो गया तब भी यहाँ के शासक चीन की पुरातन संस्कृति का अनुसरण करते रहे और वहाँ की प्रशासन पद्धति को अपनाते रहे। वियतनाम उस सिल्क रूट से भी जुड़ा हुआ था जो जल मार्ग से होकर जाता था। इस कारण से यहाँ सदियों से माल, लोग और विचार आयातित होते रहे। व्यापार के अन्य रास्तों से यह अंदर के इलाकों से भी जुड़ा हुआ था जहाँ गैर वियतनामी लोग रहते थे; जैसे कि ख्मेर कम्बोडियन।

उपनिवेश का निर्माण: फ्रांस की सेना 1858 में वियतनाम पहुँची थी। 1880 के दशक के मध्य तक पूरे उत्तरी इलाके पर फ्रांसीसी सेना का कब्जा हो चुका था। फ्रांस और चीन की लड़ाई के बाद फ्रांस का नियंत्रण टोंकिन और अनम पर भी हो गया। इस तरह से 1887 में फ्रेंच इंडो चीन का निर्माण हुआ।

फ्रांस के लिए उपनिवेश का क्या मतलब था?

यूरोप की शक्तियों को प्राकृतिक संसाधनों और अन्य चीजों की मांग को पूरा करने के लिये उपनिवेश की जरूरत होने लगी। यूरोपीय शक्तियों का यह भी मानना था कि पिछड़े लोगों को सुधारना उनकी जिम्मेदारी थी क्योंकि वे ‘विकसित’ थे।
फ्रांसीसियों ने मेकांग डेल्टा की जमीन को सींचने के लिये नहर बनाने शुरु कर दिये ताकि फसल की पैदावार बढ़ाई जा सके। इससे चावल की पैदावार बढ़ाने में काफी मदद मिली। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 1900 में कुल 274,000 हेक्टेअर जमीन पर चावल की खेती होती थी जो 1930 में बढ़कर 11 लाख हेक्टेअर हो गई। 1931 आते-आते वियतनाम से धान की कुल उपज का दो तिहाई हिस्सा निर्यात होने लगा। इस तरह से वियतनाम धान निर्यात करने वाला दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश बन गया था।
उसके बाद वहाँ पर आधारभूत सुविधाओं को बनाने का काम शुरु हुआ। सामान और सैनिकों को आसानी से लाने ले जाने के लिये यह जरूरी था। फ्रांसीसियों ने एक सकल इंडो चीन रेल तंत्र पर काम शुरु किया। चीन में युन्नान से आखिरी रेल लिंक 1910 में बनकर पूरा हुआ। एक दूसरी लाइन बनाई गई जो वियतनाम को सियाम से जोड़ती थी। थाइलैंड का पुराना नाम सियाम है।

क्या उपनिवेशों को विकसित करना चाहिए?

पॉल बर्नार्ड एक जाने माने फ्रांसीसी विचारक थे; जिनका मानना था कि वियतनाम के लोगों को खुशहाल बनाने के लिये मूलभूत सुविधाओं का निर्माण जरूरी था। यदि लोग खुशहाल होते तो फ्रांस के व्यवसाय के लिये बेहतर बाजार का निर्माण हो सकता था। उन्होंने खेती की पैदावार बढ़ाने के लिये भू-सुधार पर भी बल दिया।
उस दौरान वियतनाम की अर्थव्यवस्था मुख्य रुप से धान और रबर की खेती पर निर्भर करती थी। इन्हीं क्षेत्रों को और सुविधा मुहैया कराने के लिए रेल और बंदरगाहों का निर्माण किया गया। लेकिन वियतनाम की अर्थव्यवस्था के औद्योगिकरण के लिए फ्रांसीसियों ने कुछ भी नहीं किया।

उपनिवेशी शिक्षा पद्धति की दुविधा:

अन्य यूरोपियन शक्तियों की तरह फ्रांस भी अपनी ‘आधुनिक’ संस्कृति को वियतनाम के लोगों पर थोपना चाहता था। उनका मानना था कि वियतनामियों को सुधारने के लिये यह आवश्यक था। फ्रांसीसी लोग स्थानीय लोगों को इसलिये भी शिक्षित करना चाहते थे ताकि क्लर्की करने के लिये उन्हें श्रमिक मिल सकें। लेकिन वे अच्छी शिक्षा देने से बचते रहे। उन्हें डर था कि अच्छी शिक्षा से लोगों में जागृति आ जायेगी जिससे उपनिवेशी शासकों के लिये खतरा पैदा हो जायेगा।

आधुनिक होने का मतलब

वियतनाम के संभ्रांत लोगों पर चीनी संस्कृति का गहरा प्रभाव था। इस प्रभाव को कम करना फ्रांसीसियों के लिये महत्वपूर्ण था। पुरानी शिक्षा पद्धति को योजनाबद्ध तरीके से तहस नहस किया गया और उसकी जगह नई शिक्षा पद्धति को जमाने की कोशिश की गई। लेकिन संभ्रांत लोगों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली चीनी भाषा को उखाड़ फेंकना बहुत मुश्किल साबित हो रहा था।
कुछ फ्रांसीसी नीति निर्माता चाहते थे कि पढ़ाई का मीडियम फ्रेंच हो। वे एक ऐसा एशियाई फ्रांस बनाना चाहते थे जिसके तार यूरोप के फ्रांस से मजबूती से जुड़े हों।
कुछ अन्य विचारकों को लगता था कि निचली क्लासों में वियतनामी भाषा पढ़ाई जाये और उँचे क्लासों में फ्रेंच भाषा पढ़ाई जाये। जो कोई भी फ्रेंच भाषा और फ्रेंच संस्कृति में महारत हासिल कर लेता था उसके लिए फ्रांस की नागरिकता का भी प्रावधान रखा गया।
लेकिन फ्रेंच क्लास की फाइनल परीक्षा में छात्रों को जानबूझकर फेल कर दिया जाता था। ऐसा इसलिए किया जाता था ताकि स्थानीय लोग अच्छी तनख्वाह वाली नौकरियों के लिए आगे न आ पाएँ। स्कूल की किताबों में फ्रेंच संस्कृति का गुणगान किया जाता था और उपनिवेशी शासन को उचित बताया जाता था। इन किताबों में वियतनामियों को पिछड़ा दिखाया जाता था।
फ्रांसीसियों के मुताबिक आधुनिक होने का मतलब था पश्चिमी संस्कृति की नकल करना। वियतनामी लोग लंबे बाल रखते थे जबकी छोटे बालों को बढ़ावा दिया जाता था।

स्कूलों में विरोध

लेकिन स्कूलों में इन बातों का विरोध होता था। शिक्षक और छात्र सिलेबस में लिखी बातों को पूरी तरह नहीं मानते थे। कुछ विरोध खुले तौर पर होते थे तो कुछ चुपचाप। जब निचली क्लासों में वियतनामी शिक्षकों की संख्या बढ़ गई तो इसपर नियंत्रण रखना संभव नहीं रह गया कि वास्तव में क्या पढ़ाय जा रहा था।
वियतनाम में राष्ट्रवाद की भावना को जन्म देने के लिए स्कूलों ने अहम भूमिका निभाई। 1920 का दशक आते-आते छात्रों ने राजनैतिक पार्टियाँ बनानी शुरु कर दी और राष्ट्रवादी पत्रिकाएँ भी निकालने लगे। यंग अन्नन पार्टी (एक राजनैतिक पार्टी) और अन्ननीज स्टूडेंट (एक पत्रिका) इसके कुछ उदाहरण हैं।
फ्रेंच शिक्षा और संस्कृति का थोपा जाना उल्टा पड़ने लगा था क्योंकि वियतनाम के बुद्धिजीवी इसे अपनी संस्कृति के लिए खतरा मानते थे।

साफ सफाई और बीमारियाँ

हनोई शहर के निर्माण में आधुनिक इंजीनियरिंग और आर्किटेक्चर का इस्तेमाल हुआ था। उपनिवेशी शासकों के लिये सुंदर शहर बनाया गया था जहाँ चौड़ी-चौड़ी सड़कें और नालियाँ थीं। लेकिन स्वच्छता के मिसाल के तौर पर जो नालियाँ बनीं थीं उनमें चूहों की जनसंख्या तेजी से बढ़ने लगी। इसके परिणामस्वरूप हनोई में प्लेग की महामारी फैल गई।

चूहों का शिकार

प्लेग की रोकथाम के लिये 1902 में चूहों को पकड़ने की स्कीम शुरु की गई। इस काम के लिये वियतनाम के मजदूरों को लगाया गया और प्रति चूहे की दर से उन्हें पैसे मिलते थे। लोगों ने हजारों की संख्या में चूहे पकड़ने शुरु किये। चूहा मारने के सबूत के तौर पर चूहे की पूँछ को दिखाना होता था और मेहनताना मिल जाता था। कई लोगों ने इस मौके का फायदा उठाया। लोग चूहों की दुम काटने लगे और पैसे कमाने लगे। कई लोगों ने तो चूहों को पालना शुरु कर दिया ताकि अच्छी कमाई कर सकें। इस घटना से यह पता चलता है कि कुछ परिस्थितियों में बहुत ताकतवर लोग भी असहाय हो जाते हैं और कमजोर लोग मजबूत स्थिति में आ जाते हैं।

धर्म और उपनिवेश

वियतनाम की धार्मिक मान्यताओं में बुद्ध, कंफ्यूसियस और कई स्थानीय रीतियों का मिश्रण था। फ्रेंच मिशनरियों ने वहाँ इसाई धर्म को लाया था। स्थानीय लोगों को धर्म परिवर्तन का यह प्रयास पसंद नहीं आया। अठारहवीं सदी से ही पश्चिमी मान्यताओं के खिलाफ कई धार्मिक आंदोलन शुरु हो गए। 1969 का स्कॉलर रिवोल्ट ऐसा ही एक आंदोलन था जो इसाई धर्म के खिलाफ था।

हुइन फू सो: इसी तरह के आंदोलनों में से एक था होआ हाओ। इसकी शुरुआत 1939 में हुई थी और यह मेकॉंग डेल्टा के क्षेत्र में काफी लोकप्रिय हुआ था। यह आंदोलन उन्नीसवीं सदी के फ्रेंच विरोधी और लोकप्रिय धार्मिक भावनाओं से काफी प्रेरित था। होआ हाओ आंदोलन के जनक का नाम था हुइन फू सो। वे कई तरह के चमत्कार किया करते थे और गरीबों की मदद करते थे। वे अनाप शनाप खर्चे की आलोचना करते थे और काफी लोकप्रिय थे। उन्होंने कई सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आंदोलन चलाया; जैसे बाल विवाह, जुआ, शराब और अफीम।
फ्रेच शासकों ने हुइन फू सो के आंदोलन को कुचलने की कोशिश की। उन्होंने उसे पागल करार कर दिया और उसे पागल बोन्ये का नाम दिया। उसे एक पागलखाने में डाल दिया गया। लेकिन जिस डॉक्टर को उसे पागल होने का सर्टिफिकेट देना था वही उसका फैन बन गया। आखिर में उसे देशनिकाला देकर लाओस भेज दिया गया। उसके कई अनुयायियों को कॉन्संट्रेशन कैंपों में डाल दिया गया।
फान बोई चाऊ (1867 – 1940): वे एक राष्ट्रवादी थे जिनकी शिक्षा कन्फ्यूशियन पद्धति से हुई थी। उसने 1903 में रिवोल्यूशनरी सोसाइटी (डुई तान होई) का गठन किया जिसका नेतृत्व प्रिंस कुओंग डे करते थे। फान बोई चाऊ 1905 में योकोहामा में चीनी सुधारक लिआंग क्वीचाओ (1873 – 1929) से मिले। फान द्वारा लिखित सबसे प्रभावशाली किताब थी ‘द हिस्टरी ऑफ लॉस ऑफ वियतनाम’। इस किताब में क्वीचाओ का गहरा प्रभाव दिखता है। इस किताब में मुख्य रूप से दो मुद्दों पर बात की गई थी, स्वायत्तता का नाश और चीन के साथ टूटे हुए संबंध। वियतनाम की आजादी की लड़ाई में फान एक अग्रणी व्यक्ति के रुप में गिने जाते हैं।
फान शु ट्रिन (1871 – 1926): ये फान बोई चाऊ के विचारों के सख्त खिलाफ थे। ये राजतंत्र के खिलाफ थे और इस बात के विरोधी थे कि फ्रेंच का विरोध करने के लिए कोर्ट की मदद ली जाए। वे पश्चिम के प्रजातांत्रिक भावनाओं से बहुत प्रभावित थे। उन्हें फ्रांस के लोगों की स्वच्छंदता की भावना भी पसंद थी। वे चाहते थे कि फ्रेंच शासक कानूनी और शैक्षिक संस्थाओं का निर्माण करें और कृषि और उद्योग को बढ़ावा दें।

चीन और जापान का प्रभाव

बीसवीं सदी के पहले दशक में आधुनिक शिक्षा प्राप्त करने वियतनाम से कई छात्र जापान गये। जापान जाने का मुख्य उद्देश्य था वियतनाम से फ्रेंच लोगों को भगाना, कठपुतली राजा को हटाना और फिर से एंगुएन वंश के शासन को बहाल करना। वे जापानियों से एशियाई होने के नाते मदद की गुहार करते थे।
जापान एक आधुनिक देश बन चुका था। जापान ने पश्चिमी ताकतों द्वारा उपनिवेश बनाने की कोशिशों को नाकाम कर दिया था। 1907 में जापान की रूस पर विजय से जापान की सैन्य शक्ति साबित हो चुकी थी। 1908 के बाद जापान की मिनिस्ट्री ऑफ इंटीरियर ने वियतनामी छात्रों की क्रांतिकारी गतिविधियों पर अंकुश लगा दिया। कई क्रांतिकारियों को जापान से निकाल दिया गया। इन क्रांतिकारियों को चीन और थाइलैंड में पनाह लेने पर विवश होना पड़ा। फान बोई चाऊ भी उनमें से एक थे।
चीन में आने वाले बदलाव भी वियतनाम के राष्ट्रवादियों पर अपना प्रभाव डाल रहे थे। 1911 में सन यात सेन के नेतृत्व में एक लोकप्रिय आंदोलन हुआ था। उस आंदोलन ने लंबे समय से चले आ रहे राजतंत्र को समाप्त किया और लोकतंत्र को बहाल किया था। वियतनाम के छात्र उस घटना से काफी प्रभावित थे। उन्होंने एसोसियेशन फॉर द रिस्टोरेशन ऑफ वियतनाम (वियत कुआन फुक होई) बनाया। अब आजादी की लड़ाई का मतलब था एक लोकतंत्र की स्थापना।

कम्यूनिस्ट आंदोलन और वियतनाम का राष्ट्रवाद

1930 के दशक की आर्थिक मंदी का वियतनाम पर गहरा असर पड़ा था। चावल और रबर की कीमतों में भारी गिरावट हुई थी। इसके कारण गाँवों में बेरोजगारी बढ़ी और लोगों पर कर्जे बढ़ गए। इसके फलस्वरूप ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों ने विरोध में आवाज उठानी शुरु कर दी। नगे अन और हा तिन राज्य ऐसे प्रतिरोधों के केंद्रबिंदु थे। इन विरोधों को फ्रेंच शासकों ने कुचल दिया। विरोध को कुचलने के लिये विमान और बम का इस्तेमाल भी किया गया।

1930 की फरवरी में हो ची मिन ने कई विरोधी राष्ट्रवादी गुटों को एक साथ लाकर वियतनाम कम्यूनिस्ट पार्टी (वियतनाम कॉन्ग सन डांग) को शुरु किया। बाद में इसका नाम इंडो चाइनीज कम्यूनिस्ट पार्टी कर दिया गया।
वियतनाम में लोकतंत्र की स्थापना: जापान दक्षिण पूर्व एशिया मे अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहा था। जापान ने 1940 में वियतनाम पर कब्जा कर लिया। अब राष्ट्रवादी नेताओं को दो दुश्मनों से लड़ना पड़ रहा था; फ्रेंच और जापानी। लीग ऑफ द इंडेपेंडेंस ऑफ वियतनाम (वियत नाम डॉक लैप डोंग मिन); जिसे बाद में वियतमिन के नाम से जाना गया ने जापानी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई लड़ी और 1945 में हनोई को अपने कब्जे में ले लिया। इस तरह से डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ वियतनाम का निर्माण हुआ जिसके चेयरमैन बने हो ची मिन।

वियतनाम का विभाजन

फ्रेंच शासकों ने दोबारा वियतनाम को अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश की। इस काम के लिए वहाँ के राजा बाओ दाई को कठपुतली की तरह इस्तेमाल किया गया। वियतमिन को पहाड़ियों में भागकर छुपने को मजबूर होना पड़ा। आठ साल की लड़ाई के बाद वियतमिन ने फ्रांसीसियों को दियेन बियेन फू में 1954 में हरा दिया।
फ्रांस की हार के बाद जेनेवा में एक शांति वार्ता हुई। वियतनाम को दो भागों में विभाजित कर दिया गया; उत्तरी और दक्षिणी वियतनाम। हो ची मिन और कम्यूनिस्टों ने उत्तर में सत्ता संभाली। बाओ दाई की सरकार ने दक्षिण में सत्ता संभाली।
कुछ ही दिनों बाद नगो दिन दिएम के नेतृत्व में बाओ दाई शासन का तख्तापलट हो गया। दिएम ने एक तानाशाह शासन व्यवस्था बनाई। नेशनल लिबरेशन फ्रंट ने दिन दिएम के तानशाही शासन का विरोध किया। नेशनल लिबरेशन फ्रंट ने हो ची मिन सरकार की मदद ली और देश के एकीकरण के लिए संघर्ष किया।

अमेरिकी कब्जा

युद्ध में अमेरिका का शामिल होना: अमेरिका को यह खतरा लगने लगा कि वियतनाम में किसी कम्यूनिस्ट पार्टी की सरकार बहाल हो जाने से आसपास के इलाकों में भी वैसी ही सरकारें बन जायेंगी। अमेरिका नहीं चाहता था कि कम्युनिज्म फैले। इसलिये अमेरिका ने वियतनाम पर आक्रमण कर दिया।
वियतनाम के युद्ध में अमेरिका ने बड़ी संख्या में अपने सैनिकों का इस्तेमाल किया और अत्याधुनिक हथियारों और साज सामानों का भी इस्तेमाल किया। अत्याधुनिक तकनीक और दवाइयों की समुचित आपूर्ति के बावजूद वियतनाम में अमेरिकी सेना के सैनिक भारी संख्या में हताहत हुए। उस युद्ध में उस समय के सबसे शक्तिशाली बॉम्बर प्लेन B52 का इस्तेमाल भी किया गया। उस युद्ध में लगभग 47,000 अमेरिकी सैनिक मारे गए और 303,000 सैनिक घायल हुए। उनमें से कोई 23,000 सैनिक पूर्ण रूप से अपाहिज हो गये।

वियतनाम के लोगों का अमेरिकी शक्ति के सामने प्रदर्शन से यह साबित हो गया कि मातृभूमि की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध होने से एक कमजोर सेना में भी जान आ जाती है। अमेरिका ने इस बात को शायद नजरअंदाज कर दिया था।
अमेरिका पर प्रभाव: ज्यादातर अमेरिकी वियतनाम में अमेरिकी दखल का विरोध कर रहे थे। कई समकालीन विचारकों का मानना था कि अमेरिका को ऐसे युद्ध में पड़ना ही नहीं चाहिए था जिसमें जीतने की संभावना न के बराबर थी।
मीडिया की भूमिका: अमेरिकी मीडिया और फिल्म ने इस युद्ध की सराहना भी की और आलोचना भी। जॉन वाएन की फिल्म ग्रीन बेरेट (1968) ने वियतनाम में अमेरिकी दखलंदाजी का समर्थन किया। जॉन फोर्ड कोपोला की फिल्म ऐपोकैलिप्स नाउ (1979) ने वियतनाम में अमेरिकी दखलंदाजी की आलोचना की।

हो ची मिन ट्रेल:

यह पगडंडियों और सड़कों का एक बड़ा भारी जाल था। इसका इस्तेमाल आदमी और सामान को उत्तर से दक्षिण की ओर ले जाने के लिए किया जाता था। इसके रास्ते में कई अस्पताल और सपोर्ट बेस थे। ज्यादातर सामानों को महिलाओं और बच्चों द्वारा साइकिल से ले जाया जाता था। उस ट्रेल का ज्यादातर हिस्सा वियतनाम से बाहर लाओस और कम्बोडिया में था और उसकी शाखाएँ दक्षिण वियतनाम तक जाती थीं। सामान और लोगों की आवाजाही रोकने के लिए अमेरिका उस ट्रेल पर हमेशा बमबारी करता था। लेकिन वियतनाम के लोग तुरंत ही उसकी मरम्मत कर लेते थे। हो ची मिन ट्रेल वियतनाम के लोगों की दिलेरी और सूझबूझ की गवाही देता है।

महिलाओं की भूमिका: चीन की तुलना में वियतनाम की महिलाओं को अधिक समानता प्राप्त थी। खासकर से निचले वर्ग के लोगों में तो ये बात और भी प्रखर थी। लेकिन उनकी स्वतंत्रता सीमित थी और वे सार्वजनिक जीवन में कोई भी योगदान नहीं कर पाती थीं। राष्ट्रवादी आंदोलन के परवान चढ़ने के साथ साथ लेखकों और विचारकों ने महिलाओं को समाज के कायदे कानूनों के विरोधी के रूप में चित्रित करना शुरु कर दिया था। हो ची मिन ट्रेल से होकर सामान की सप्लाई करने के साथ साथ महिलाओं ने युद्ध में भी सक्रिय भूमिका निभाई थी। इसके अलावा शांति काल के समय अर्थव्यवस्था को ठीक करने में भी वहाँ की महिलाओं ने पूरी जिम्मेदारी उठाई।
अमेरिकी कब्जे का अंत: 1974 की जनवरी में पेरिस में एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर हुए। उस समझौते के साथ अमेरिका के साथ होने वाली लड़ाई समाप्त हुई। लेकिन साइगाओ शासन और NLF के बीच लड़ाई जारी रही। 30 अप्रैल 1975 को NLF ने साइगाओ के राष्ट्रपति भवन को अपने कब्जे में ले लिया और एक सकल वियतनाम की स्थापना की।

Extra Questions Answers

प्रश्न:1 इंडो चीन किसे कहते हैं?
उत्तर: आधुनिक वियतनाम, लाओस और कम्बोडिया के इलाकों को इंडो चीन कहा जाता है।
प्रश्न:2 फ्रेंच इंडो चीन का निर्माण कब और कैसे हुआ?
उत्तर: फ्रांस की सेना 1858 में वियतनाम पहुँची थी। 1880 के दशक के मध्य तक पूरे उत्तरी इलाके पर फ्रांसीसी सेना का कब्जा हो चुका था। फ्रांस और चीन की लड़ाई के बाद फ्रांस का नियंत्रण टोंकिन और अनम पर भी हो गया। इस तरह से 1887 में फ्रेंच इंडो चीन का निर्माण हुआ।
प्रश्न:3 यूरोपीय शक्तियों को उपनिवेश बनाने की जरूरत क्यों महसूस हुई?
उत्तर: यूरोप की शक्तियों को प्राकृतिक संसाधनों और अन्य चीजों की मांग को पूरा करने के लिये उपनिवेश की जरूरत होने लगी। यूरोपीय शक्तियों का यह भी मानना था कि पिछड़े लोगों को सुधारना उनकी जिम्मेदारी थी क्योंकि वे ‘विकसित’ थे।

प्रश्न:4 वियतनाम में उपनिवेशी शिक्षा पद्धति कि दुविधा क्या थी?
उत्तर: अन्य यूरोपियन शक्तियों की तरह फ्रांस भी अपनी ‘आधुनिक’ संस्कृति को वियतनाम के लोगों पर थोपना चाहता था। उनका मानना था कि वियतनामियों को सुधारने के लिये यह आवश्यक था। फ्रांसीसी लोग स्थानीय लोगों को इसलिये भी शिक्षित करना चाहते थे ताकि क्लर्की करने के लिये उन्हें श्रमिक मिल सकें। लेकिन वे अच्छी शिक्षा देने से बचते रहे। उन्हें डर था कि अच्छी शिक्षा से लोगों में जागृति आ जायेगी जिससे उपनिवेशी शासकों के लिये खतरा पैदा हो जायेगा।
प्रश्न:5 वियतनाम में राष्ट्रवाद की भावनाको जन्म देने में स्कूलों की क्या भूमिका थी?
उत्तर: शिक्षक और छात्र सिलेबस में लिखी बातों को पूरी तरह नहीं मानते थे। कुछ विरोध खुले तौर पर होते थे तो कुछ चुपचाप। जब निचली क्लासों में वियतनामी शिक्षकों की संख्या बढ़ गई तो इसपर नियंत्रण रखना संभव नहीं रह गया कि वास्तव में क्या पढ़ाय जा रहा था। वियतनाम में राष्ट्रवाद की भावना को जन्म देने के लिए स्कूलों ने अहम भूमिका निभाई। 1920 का दशक आते-आते छात्रों ने राजनैतिक पार्टियाँ बनानी शुरु कर दी और राष्ट्रवादी पत्रिकाएँ भी निकालने लगे। यंग अन्नन पार्टी (एक राजनैतिक पार्टी) और अन्ननीज स्टूडेंट (एक पत्रिका) इसके कुछ उदाहरण हैं।

प्रश्न:6 वियतनाम में लोकतंत्र की स्थापना कैसे हुई?
उत्तर: जापान ने 1940 में वियतनाम पर कब्जा कर लिया। अब राष्ट्रवादी नेताओं को दो दुश्मनों से लड़ना पड़ रहा था; फ्रेंच और जापानी। लीग ऑफ द इंडेपेंडेंस ऑफ वियतनाम (वियत नाम डॉक लैप डोंग मिन); जिसे बाद में वियतमिन के नाम से जाना गया ने जापानी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई लड़ी और 1945 में हनोई को अपने कब्जे में ले लिया। इस तरह से डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ वियतनाम का निर्माण हुआ जिसके चेयरमैन बने हो ची मिन।
प्रश्न:7 अमेरिका ने वियतनाम पर आक्रमण क्यों किया?
उत्तर: अमेरिका को यह खतरा लगने लगा कि वियतनाम में किसी कम्यूनिस्ट पार्टी की सरकार बहाल हो जाने से आसपास के इलाकों में भी वैसी ही सरकारें बन जायेंगी। अमेरिका नहीं चाहता था कि कम्युनिज्म फैले। इसलिये अमेरिका ने वियतनाम पर आक्रमण कर दिया।

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