4.एक ग्लोबल विश्व
इस अध्याय की मुख्य बाते:
- उपनिवेशों का विस्तार
- बीमारी और फतह
- उन्नीसवीं सदी में वैश्विक अर्थव्यवस्था का निर्माण
- पहले विश्व युद्ध का प्रभाव
- बड़े पैमाने पर उत्पादन
- आर्थिक मंदी
- भारतीय व्यवसायी और अंतर्राष्ट्रीय बाजार
- दूसरे विश्व युद्ध के बाद की स्थिति
- बेटन वुड्स इंस्टिच्यूशन
- आधुनिक भूमंडलीकरण
ऐसा सदियों से होता आया है कि व्यापार के कारण विचारों और संस्कृति का आदान प्रदान हुआ है। इस आदान प्रदान के कारण दुनिया के विभिन्न देश आपस में जुड़े हुए हैं। सिंधु घाटी की सभ्यता के युग में भी विभिन्न देशों के बीच आपसी संपर्क हुआ करता था। ये और बात है कि आधुनिक युग में यह संपर्क तेजी से बढ़ा है।
सिल्क रूट
- जो व्यापार मार्ग चीन को पश्चिमी देशों और अन्य देशों से जोड़ता था उसे सिल्क रूट कहते हैं। उस जमाने में कई सिल्क रूट थे। सिल्क रूट ईसा युग की शुरुआत के पहले से ही अस्तित्व में था और पंद्रहवीं सदी तक बरकरार था।
- सिल्क रूट से होकर चीन के बर्तन दूसरे देशों तक जाते थे। इसी प्रकार यूरोप से एशिया तक सोना और चाँदी इसी सिल्क रूट से आते थे।
- सिल्क रूट के रास्ते ही ईसाई, इस्लाम और बौद्ध धर्म दुनिया के विभिन्न भागों में पहुँच पाए थे।
भोजन की यात्रा
व्यापार के कारण एक देश का भोजन दूसरे देश तक पहुँचा है। इसको समझने के लिये नूडल का उदाहरण लेते हैं। यह चीन की देन है जो आज पूरी दुनिया में विभिन्न रूपों में इस्तेमाल होता है। भारत में यह सेवियों के रूप में इस्तेमाल होता है तो इटली में स्पैगेटी के रूप में।
आज आलू, टमाटर, मिर्च, सोया, मक्का, मूंगफली और शकरकंद पूरी दुनिया में आम खाद्य पदार्थ की तरह इस्तेमाल किये जाते हैं। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि ये पदार्थ यूरोप में तब आये जब क्रिस्टोफर कोलंबस ने गलती से अमेरिकी महाद्वीपों को खोजा था।
आलू ने यूरोप के लोगों का जीवन ही बदल दिया। आलू ने यूरोप के लोगों को एक ऐसा विकल्प दिया कि वे बेहतर खाना खा सकें और अधिक दिन तक जी सकें। आयरलैंड में आलू पर निर्भरता इतनी बढ़ चुकी थी कि जब 1840 के दशक में किसी बीमारी से आलू की फसल तबाह हो गई तो कई लाख लोग भूख से मर गये। उस अकाल को आइरिस अकाल के नाम से जाना जाता है।
बीमारी, व्यापार और फतह
सोलहवीं सदी में यूरोप के नाविकों ने एशिया और अमेरिका के देशों के लिए समुद्री मार्ग खोज लिया था। नए समुद्री मार्ग की खोज ने न सिर्फ व्यापार को फैलाने में मदद की बल्कि विश्व के अन्य भागों में यूरोप की फतह की नींव भी रखी।
अमेरिका के पास खनिजों का अकूत भंडार था और यहाँ अनाज भी प्रचुर मात्रा में था। अमेरिका के अनाज और खनिजों ने दुनिया के अन्य भाग के लोगों का जीवन पूरी तरह से बदल दिया।
सोलहवीं सदी के मध्य तक पुर्तगाल और स्पेन द्वारा अमेरिकी उपनिवेशों की अहम शुरुआत हो चुकी थी। लेकिन यूरोपियन की यह जीत किसी हथियार के कारण नहीं बल्कि एक बीमारी के कारण संभव हो पाई थी। चेचक की बीमारी ने यूरोप के लोगों पर पहले ही आक्रमण किया था। इसलिये यूरोप के लोगों के शरीर में इस बीमारी के खिलाफ प्रतिरोधन क्षमता विकसित हो चुकी थी। लेकिन तब तक अमेरिका दुनिया के अन्य भागों से अलग थलग था। इसलिये अमेरिकी लोगों के शरीर में चेचक से लड़ने के लिये प्रतिरोधन क्षमता विकसित नहीं हुई थी। जब यूरोप के लोग अमेरिका पहुँचे तो वे अपने साथ चेचक के जीवाणु भी ले गये। इससे अमेरिका के लोगों में चेचक की बीमारी फैलने लगी। इस बीमारी ने अमेरिका के कुछ भागों की पूरी आबादी साफ कर दी। इस तरह से यूरोपियन लोगों को अमेरिका पर आसानी से जीत हासिल हो गई।
उन्नीसवीं सदी तक यूरोप में कई समस्याएँ थीं; जैसे गरीबी, बीमारी और धार्मिक टकराव। धर्म के खिलाफ बोलने वाले कई लोग सजा के डर से अमेरिका भाग गए थे। उन्होंने अमेरिका में मिलने वाले अवसरों का भरपूर इस्तेमाल किया और इससे उनकी काफी तरक्की हुई।
अठारहवीं सदी तक भारत और चीन दुनिया के सबसे धनी देश हुआ करते थे। लेकिन पंद्रहवीं सदी से ही चीन ने बाहरी संपर्क पर अंकुश लगाना शुरु किया था और दुनिया के बाकी हिस्सों से अलग थलग हो गया था। चीन के घटते प्रभाव और अमेरिका के बढ़ते प्रभाव के कारण विश्व के व्यापार का केंद्रबिंदु यूरोप की तरफ शिफ्ट कर रहा था।
उन्नीसवीं शताब्दी (1815 – 1914)
उन्नीसवीं सदी में दुनिया तेजी से बदल रही थी। इस अवधि में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और तकनीकी के क्षेत्र में बड़े जटिल बदलाव हुए। उन बदलावों की वजह से विभिन्न देशों के रिश्तों के समीकरण में अभूतपूर्व बदलाव आए।
अर्थशास्त्री मानते हैं कि आर्थिक आदान प्रदान तीन प्रकार के होते हैं जो निम्नलिखित हैं:
- व्यापार का आदान प्रदान
- श्रम का आदान प्रदान
- पूँजी का आदान प्रदान
वैश्विक अर्थव्यवस्था का निर्माण
यूरोप में भोजन के उत्पादन और उपभोग का बदलता स्वरूप: पारंपरिक तौर पर ऐसा देखा गया है कि हर देश भोजन के मामले में आत्मनिर्भर होना चाहता है। लेकिन यूरोप में भोजन के लिये आत्मनिर्भर होने का मतलब था लोगों के लिये घटिया क्वालिटी का भोजन मिलना।
अठारहवीं सदी में यूरोप की जनसंख्या में भारी वृद्धि के कारण भोजन की माँग में भी तेजी से वृद्धि हुई। सरकार को जमींदारों के दबाव के कारण मक्के के आयात पर नियंत्रण लगाना पड़ा। इसके फलस्वरूप ब्रिटेन में भोजन की कीमतें बढ़ गईं। उसके बाद उद्योगपतियों और शहरी लोगों ने सरकार को इस बात के लिये बाध्य किया कि कॉर्न लॉ समाप्त किया जाये।
कॉर्न लॉ हटने के प्रभाव:
कॉर्न लॉ के समाप्त होने से बाहर से सस्ता अनाज ब्रिटेन में आयात होने लगा। ब्रिटेन में उपजाया जाने वाला अनाज महंगा था इसलिये सस्ते आयात के आगे टिक नहीं सकता था।
किसानों ने खेती की जमीन का एक बड़ा हिस्सा खाली छोड़ दिया। लोग भारी संख्या में बेरोजगार हो गये। इसके परिणामस्वरूप गाँवों से भारी संख्या में लोग शहरों की ओर पलायन करने लगे। कई लोग तो रोजगार की तलाश में विदेशों की तरफ भी पलायन कर गये।
दाम गिरने से ब्रिटेन में खाने पीने की चीजों की माँग बढ़ने लगी। औद्योगीकरण के कारण लोगों की आमदनी भी बढ़ने लगी थी। इसलिये ब्रिटेन में अतिरिक्त भोजन आयात करने की जरूरत होने लगी। इस माँग को पूरा करने के लिये पूर्वी यूरोप, अमेरिका, रूस और ऑस्ट्रेलिया में जमीन के एक बड़े हिस्से को साफ किया जाने लगा।
अनाज को खेतों से बंदरगाहों तक सही समय पर पहुँचाना भी जरूरी हो गया था। इसके लिये रेल लाइनें बिछाई गईं और खेतों को बंदरगाहों से जोड़ा गया। खेतों पर काम करने के लिये आसपास नई आबादी बसाने की जरूरत भी महसूस हुई। इन जरूरतों को पूरा करने के लिये लंदन जैसे वित्तीय केंद्रों से इन स्थानों तक पूँजी भी आने लगी।
अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में मजदूरों की किल्लत हो रही थी। इस कमी को पूरा करने के लिये लोग भारी संख्या में पलायन करके वहाँ पहुँचने लगे। उन्नीसवीं सदी में लगभग पाँच करोड़ लोग यूरोप से अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया पहुँच चुके थे। इस अवधि में पूरी दुनिया के विभिन्न भागों से लगभग 15 करोड़ लोगों का पलायन हुआ था। इस तरह से 1890 का दशक आते-आते कृषि क्षेत्र में एक वैश्विक अर्थव्यवस्था का निर्माण हो चुका था। इस के साथ श्रम और पूँजी के प्रवाह तथा तकनीकी बदलाव के क्षेत्र में बड़े ही जटिल बदलाव आये।
तकनीक की भूमिका
इस दौरान विश्व की अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण में टेकनॉलोजी ने एक अहम भूमिका निभाई। इस युग के कुछ मुख्य तकनीकी खोज हैं रेलवे, स्टीम शिप और टेलिग्राफ।
- रेलवे ने बंदरगाहों और आंतरिक भूभागों को आपस में जोड़ दिया।
- स्टीम शिप के कारण माल को भारी मात्रा में अतलांतिक के पार ले जाना आसान हो गया।
- टेलीग्राफ की मदद से संचार व्यवस्था में तेजी आई और इससे आर्थिक लेन देन बेहतर रूप से होने लगे।
मीट का व्यापार: मीट का व्यापार इस बात का बहुत अच्छा उदाहरण है कि नई टेक्नॉलोजी से किस तरह आम आदमी का जीवन बेहतर हो जाता है। 1870 के दशक तक जानवरों को जिंदा ही अमेरिका से यूरोप ले जाया जाता था। जिंदा जानवरों को जहाज से ले जाने में कई परेशानियाँ होती थीं। वे ज्यादा जगह लेते थे। कई जानवर रास्ते में बीमार हो जाते थे या मर भी जाते थे। इसके कारण यूरोप के ज्यादातर लोगों के लिए मीट एक विलासिता की वस्तु ही थी।
रेफ्रिजरेशन टेक्नॉलोजी ने तस्वीर बदल दी। अब जानवरों को अमेरिका में हलाल किया जा सकता था और प्रोसेस्ड मीट को यूरोप ले जाया जा सकता था। इससे जहाज में उपलब्ध जगह का बेहतर इस्तेमाल संभव हो पाया। इससे कीमतें गिर गईं और यूरोप में मीट अधिक मात्रा में उपलब्ध होने लगा। अब आम आदमी भी नियमित रूप से मीट खा सकता था।
लोगों का पेट भरा होने के कारण देश में सामाजिक शाँति आ गई। अब ब्रिटेन के लोग अपने देश की उपनिवेशी महात्वाकाँछा को गले उतारने को तैयार लगने लगे।
उन्नीसवीं सदी का उत्तरार्ध और उपनिवेशवाद
एक तरफ व्यापार के फैलने से यूरोप के लोगों की जिंदगी बेहतर हो गई तो दूसरी तरफ उपनिवेशों के लोगों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ा।
जब अफ्रिका के आधुनिक नक्शे को गौर से देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि ज्यादातर देशों की सीमाएँ सीधी रेखा में हैं जो अन्य महादेशों में देखने को नहीं मिलता है। ऐसा लगता है जैसे किसी छात्र ने सीधी रेखाएँ खींच दी हो। 1885 में यूरोप की बड़ी शक्तियाँ बर्लिन में मिलीं और अफ्रिकी महादेश को आपस में बाँट लिया। इस तरह से अफ्रिका के ज्यादातर देशों की सीमाएँ सीधी रेखाओं में बन गईं।
रिंडरपेस्ट
रिंडरपेस्ट या मवेशियों का प्लेग: रिंडरपेस्ट मवेशियों में होने वाली एक बीमारी है। अफ्रिका में रिंडरपेस्ट के का उदाहरण बताता है कि किस तरह से एक बीमारी किसी भूभाग में शक्ति के समीकरण को भारी तौर पर प्रभावित कर सकती है।
अफ्रिका वैसा महादेश था जहाँ पर जमीन और खनिजों का अकूत भंडार था। यूरोपीय लोग खनिज और बागानों से धन कमाने के लिए अफ्रिका पहुँचे थे। लेकिन उन्हें वहाँ मजदूरों की भारी कमी झेलनी पड़ी। अफ्रिका की आबादी बहुत कम थी और वहाँ संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे। इसलिये वहाँ के लोगों की जरूरतें आसानी से पूरी हो जाती थीं। इसलिये अधिक मेहनताना देने के बावजूद अफ्रिका के लोग मेहनत नहीं करना चाहते थे। उन्हें इस की कोई जरूरत नहीं होती थी कि पैसे कमाने के लिये काम करें।
यूरोपीय लोगों ने अफ्रिका के लोगों को रास्ते पर लाने के लिए कई तरीके अपनाए। उनमें से कुछ नीचे दिये गये हैं।
- लोगों पर इतना अधिक टैक्स लगाया गया कि उसे केवल वो ही अदा कर पाते थे जो खानों और बागानों में काम करते थे।
- उत्तराधिकार के कानून को बदल दिया गया। अब किसी भी परिवार का एक ही सदस्य जमीन का उत्तराधिकारी बन सकता था। इससे अन्य लोगों को मजदूरी करने पर बाध्य होना पड़ा।
- खान में काम करने वाले मजदूरों को कैंपस के भीतर ही रखा जाता था और उन्हें खुला घूमने की छूट नहीं थी।
रिंडरपेस्ट का प्रकोप
रिंडरपेस्ट का अफ्रिका में आगमन 1880 के दशक के आखिर में हुआ था। यह बीमारी उन घोड़ों के साथ आई थी जो ब्रिटिश एशिया से लाए गए थे। इन घोड़ों को इटैलियन सैनिकों की मदद के लिए लाया गया था जो पूर्वी अफ्रिका में एरिट्रिया पर आक्रमण कर रहे थे। रिंडरपेस्ट पूरे अफ्रिका में किसी जंगल की आग की तरह फैल गई। यह बीमारी इतनी तेजी से फैली कि 1892 आते आते बीमारी अफ्रिका के पश्चिमी तट तक पहुँच चुकी थी। इस दौरान रिंडरपेस्ट ने अफ्रिका के मवेशियों की आबादी का 90% हिस्सा साफ कर दिया।
अफ्रिकियों के लिए मवेशियों का नुकसान होने का मतलब था रोजी रोटी पर खतरा। अब उनके पास खानों और बागानों में मजदूरी करने के अलावा और कोई चारा नहीं था। इस तरह से मवेशियों की एक बीमारी ने यूरोपियन को अफ्रिका में अपना उपनिवेश फैलाने में मदद की।
भारत से बंधुआ मजदूरों का पलायन
वैसे मजदूर जो किसी खास मालिक के लिए किसी खास अवधि के लिए काम करने को प्रतिबद्ध होते हैं बंधुआ मजदूर कहलाते हैं। आधुनिक बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य भारत और तामिल नाडु के सूखाग्रस्त इलाकों से कई गरीब लोग बंधुआ मजदूर बन गए। इन लोगों को मुख्य रूप से कैरेबियन आइलैंड, मॉरिशस और फिजी भेजा गया। कई को सीलोन और मलाया भी भेजा गया। भारत में कई बंधुआ मजदूरों को असम के चाय बागानों में भी काम पर लगाया गया।
मजदूरों को बहाल करने वाले एजेंट अक्सर झूठे वादे करते थे। इन मजदूरों को ये भी पता नहीं होता था कि वे कहाँ जा रहे हैं। इन मजदूरों के लिए नई जगह पर बड़ी भयावह स्थिति हुआ करती थी। उनके पास कोई कानूनी अधिकार नहीं होते थे और उन्हें कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ता था।
1900 के दशक से भारत के राष्ट्रवादी नेता बंधुआ मजदूर के सिस्टम का विरोध करने लगे थे। इस सिस्टम को 1921 में समाप्त कर दिया गया।
विदेशों में भारतीय व्यवसायी
इस दौरान भारत के व्यवसायियों ने भी तरक्की की और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में हिस्सा लेने लगे।
शिकारीपुरी श्रौफ और नट्टुकोट्टई चेट्टियार का नाम भारत के नामी बैंकर और व्यवसायियों में आता है। वे दक्षिणी और केंद्रीय एशिया में कृषि निर्यात में पूँजी लगाते थे। भारत में और विश्व के विभिन्न भागों में पैसा भेजने के लिए उनका अपना ही एक परिष्कृत सिस्टम हुआ करता था।
भारत के व्यवसायी और महाजन उपनिवेशी शासकों के साथ अफ्रिका भी पहुँच चुके थे। हैदराबाद के सिंधी व्यवसायी तो यूरोपियन उपनिवेशों से भी आगे निकल गये थे। 1860 के दशक तक उन्होंने पूरी दुनिया के महत्वपूर्ण बंदरगाहों पर फलते फूलते इंपोरियम भी बना लिये थे।
भारतीय व्यापार, उपनिवेश और वैश्विक सिस्टम
भारत से उम्दा कॉटन के कपड़े वर्षों से यूरोप निर्यात हो रहे थे। लेकिन औद्योगीकरण के बाद स्थानीय उत्पादकों ने ब्रिटिश सरकार को भारत से आने वाले कॉटन के कपड़ों पर प्रतिबंध लगाने के लिए बाध्य किया। इससे ब्रिटेन में बने कपड़े भारत के बाजारों में भारी मात्रा में आने लगे। 1800 में भारत के निर्यात में 30% हिस्सा कॉटन के कपड़ों का था। 1815 में यह गिरकर 15% हो गया और 1870 आते आते यह 3% ही रह गया। लेकिन 1812 से 1871 तक कच्चे कॉटन का निर्यात 5% से बढ़कर 35% हो गया। इस दौरान निर्यात किए गए सामानों में नील (इंडिगो) में तेजी से बढ़ोतरी हुई। भारत से सबसे ज्यादा निर्यात होने वाला सामान था अफीम जो मुख्य रूप से चीन जाता था।
भारत से ब्रिटेन को कच्चे माल और अनाज का निर्यात बढ़ने लगा और ब्रिटेन से तैयार माल का आयात बढ़ने लगा। भारत कच्चे माल का निर्यातक बन गया और तैयार उत्पाद का आयातक बन गया। इससे एक ऐसी स्थिति आ गई जब ट्रेड सरप्लस ब्रिटेन के हित में हो गया। इस तरह से बैलेंस ऑफ पेमेंट ब्रिटेन के फेवर में था। भारत के बाजार से जो आमदनी होती थी उसका इस्तेमाल ब्रिटेन अन्य उपनिवेशों की देखरेख करने के लिए करता था। ब्रिटेन इस पैसे का इस्तेमाल भारत में रहने वाले अपने ऑफिसर को ‘होम चार्ज’ देने के लिए करता था। भारत के बाहरी कर्जे की भरपाई और रिटायर ब्रिटिश ऑफिसर (जो भारत में थे) का पेंशन का खर्चा भी होम चार्ज के अंदर ही आता था।
युद्ध काल की अर्थव्यवस्था
पहले विश्व युद्ध ने पूरी दुनिया को कई मायनों में झकझोर कर रख दिया था। लगभग 90 लाख लोग मारे गए और 2 करोड़ लोग घायल हो गये।
मरने वाले या अपाहिज होने वालों में ज्यादातर लोग उस उम्र के थे जब आदमी आर्थिक क्रियाओं के लिये सक्रिय होता है। इससे यूरोप में सक्षम शरीर वाले कामगारों की भारी कमी हो गई। परिवारों में कमाने वालों की संख्या कम हो जाने के कारण पूरे यूरोप में लोगों की आमदनी घट गई।
ज्यादातर पुरुषों को युद्ध में शामिल होने के लिए बाध्य होना पड़ा। इसलिये कारखानों में महिलाएँ काम करने लगीं। जो काम पारंपरिक रूप से पुरुषों के काम माने जाते थे उन्हें अब महिलाएँ कर रहीं थीं।
इस युद्ध के बाद दुनिया की कई बड़ी आर्थिक शक्तियों के बीच के संबंध टूट गये। ब्रिटेन को युद्ध के खर्चे उठाने के लिए अमेरिका से कर्ज लेना पड़ा। इस युद्ध ने अमेरिका को एक अंतर्राष्ट्रीय कर्जदार से अंतर्राष्ट्रीय साहूकार बना दिया। अब विदेशी सरकारों और लोगों की अमेरिका में संपत्ति की तुलना मंि अमेरिकी सरकार और उसके नागरिकों की विदेशों में ज्यादा संपत्ति थी।
युद्ध के बाद के सुधार
जब ब्रिटेन युद्ध में व्यस्त था तब जापान और भारत में उद्योग का विकास हुआ। युद्ध के बाद ब्रिटेन को अपना पुराना दबदबा कायम करने में परेशानी होने लगी। ब्रिटेन अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जापान से टक्कर लेने में अक्षम पड़ रहा था। युद्ध के बाद ब्रिटेन पर अमेरिका का भारी कर्जा लद चुका था।
युद्ध के समय ब्रिटेन में चीजों की माँग में तेजी आई थी जिससे वहाँ की अर्थव्यवस्था फल फूल रही थी। लेकिन युद्ध समाप्त होने के बाद माँग में गिरावट आई। युद्ध के बाद ब्रिटेन के 20% कामगारों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा।
युद्ध के पहले पूर्वी यूरोप गेहूँ का मुख्य निर्यातक था। लेकिन युद्ध के दौरान पूर्वी यूरोप के युद्ध में शामिल हो गया था। इस वजह से कनाडा, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया गेहूँ के मुख्य निर्यातक के रूप में उभरे थे। जैसे ही युद्ध खत्म हुआ पूर्वी यूरोप ने फिर से गेहूँ की सप्लाई शुरु कर दी। इसके कारण बाजार में गेहूँ की अधिक खेप आ गई और कीमतों में भारी गिरावट हुई। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में तबाही आ गई।
बड़े पैमाने पर उत्पादन और उपभोग की शुरुआत
अमेरिका की अर्थव्यवस्था में युद्ध के बाद के झटकों से तेजी से निजात मिलने लगी। 1920 के दशक में बड़े पैमाने पर उत्पादन अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मुख्य पहचान बन गई। फोर्ड मोटर के संस्थापक हेनरी फोर्ड मास प्रोडक्शन के जनक माने जाते हैं। बड़े पैमाने पर उत्पादन करने से उत्पादन क्षमता बढ़ी और कीमतें घटीं। अमेरिका के कामगार बेहतर कमाने लगे इसलिए उनके पास खर्च करने के लिए ज्यादा पैसे थे। इससे विभिन्न उत्पादों की माँग तेजी से बढ़ी।
कार का उत्पादन 1919 में 20 लाख से बढ़कर 1929 में 50 लाख हो गया। इसी तरह से बजाजी सामानों; जैसे रेफ्रिजरेटर, वाशिंग मशीन, रेडियो, ग्रामोफोन, आदि की माँग भी तेजी से बढ़ने लगी। अमेरिका में घरों की माँग में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई। आसान किस्तों पर कर्ज की सुविधा के कारण इस माँग को और हवा मिली।
इस तरह से अमेरिकी अर्थव्यवस्था खुशहाल हो गई। 1923 में अमेरिका ने दुनिया के अन्य हिस्सों को पूँजी निर्यात करना शुरु किया और सबसे बड़ा विदेशी साहूकार बन गया। इससे यूरोप की अर्थव्यवस्था को भी सुधरने का मौका मिला और पूरी दुनिया का व्यापार अगले छ: वर्षों तक वृद्धि दिखाता रहा।
विश्वव्यापी मंदी
जरूरत से ज्यादा कृषि उत्पादन: 1920 के दशक में कृषि क्षेत्र में जरूरत से ज्यादा उत्पादन एक अहम समस्या थी। कृषि उत्पादों की अत्यधिक सप्लाई के कारण कीमतें गिर रही थीं। किसानों ने इसकी भरपाई के लिए और भी अधिक उत्पादन करना शुरु किया। इसके कारण बाजार में कृषि उत्पादों की बाढ़ आ गई; जिससे कीमतें और नीचे गिरीं। खरीददारों की कमी के कारण कृषि उत्पाद सड़ने लगे।
अमेरिका द्वारा कर्ज में कमी: कई यूरोपीय देश कर्जे के लिए अमेरिका पर बुरी तरह से निर्भर थे। लेकिन अमेरिका के साहूकार थोड़ी ही बात पर घबराहट दिखाने लगते थे। 1928 के शुरुआती छ: महीने में अमेरिका द्वारा दिये गये कर्ज की राशि थी 100 करोड़ डॉलर। लेकिन एक साल के भीतर यह राशि घटकर 24 करोड़ रह गई। अमेरिका द्वारा हाथ खींच लिए जाने के कारण कई देशों की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ा।
इससे कई बैंक तबाह हो गये और यूरोप की मुद्राएँ भी बर्बाद हो गईं। इस दौरान ब्रिटिश पाउंड स्टर्लिंग में भी भारी गिरावट आई। लैटिन अमेरिका का कृषि बाजार तेजी से लुढ़क गया।
अमेरिका ने अपनी अर्थव्यवस्था को संरक्षण देने के लिए आयात पर लगने वाली ड्यूटी को दोगुना कर दिया। इससे भी विश्व की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ा।
आर्थिक मंदी का सबसे बुरा असर अमेरिका पर पड़ा। कीमतें गिरती जा रहीं थीं और अर्थव्यवस्था का बुरा हाल था। अमेरिकी बैंकों ने कर्जे देने मे कमी कर दी और पुराने कर्जों को वापस बुलाना शुरु किया। लोगों की आमदनी घट गई और ज्यादातर लोग ऐसी स्थिति में आ गए कि पुराने कर्जे चुकाने में असमर्थ हो गए। बेरोजगारी बढ़ गई और बैंकों के लिए कर्ज के पैसे वसूलना असंभव होने लगा था।
अमेरिका में हजारों बैंक दिवालिया हो गए। 1933 आते आते 4000 से अधिक बैंक बंद हो गए। 1929 से 1932 के बीच लगभग 110,000 कंपनियाँ बंद हो गईं।
1935 से ज्यादातर देशों में थोड़ा सुधार शुरु हुआ।
आर्थिक मंदी और भारत
- आर्थिक मंदी से भारत की अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ा। 1928 से 1934 के बीच भारत का आयात और निर्यात घटकर आधा हो गया। इसी दौरान भारत में गेहूँ की कीमतों में 50% की कमी आई।
- कृषि उत्पादों की घटती कीमतों के बावजूद सरकार किसानों से पहले दर पर ही लगान वसूलना चाहती थी। इस तरह से इस स्थिति में किसानों की हालत सबसे ज्यादा खराब थी। कई किसानों को अपनी जमापूँजी निकालनी पड़ी और जमीन और जेवर भी बेचने पड़े। इस तरह से भारत महँगी धातुओं का निर्यातक बन गया।
- भारत के शहरी क्षेत्रों में आर्थिक मंदी का उतना असर नहीं पड़ा। कीमतें घटने के कारण शहर में रहने वाले लोगों का जीवन पहले से आसान हो गया था। भारत के राष्ट्रवादी नेताओं के दवाब के कारण उद्योगों को अधिक संरक्षण मिलने लगा जिससे उद्योग में अधिक निवेश हुआ।
युद्ध के बाद के समझौते
दूसरा विश्व युद्ध पहले के युद्धों की तुलना में बिलकुल अलग था। इस युद्ध में आम नागरिक अधिक संख्या में मारे गये थे और कई महत्वपूर्ण शहर बुरी तरह बरबाद हो चुके थे। दूसरे विश्व युद्ध के बाद की स्थिति में सुधार मुख्य रूप से दो बातों से प्रभावित हुए थे।
- पश्चिम में अमेरिका का एक प्रबल आर्थिक, राजनैतिक और सामरिक शक्ति के रूप में उदय
- सोवियत यूनियन का एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था से विश्व शक्ति के रूप में परिवर्तन
विश्व के नेताओं की मीटिंग हुई जिसमें युद्ध के बाद के संभावित सुधारों पर चर्चा की गई। उन्होंने दो बातों पर ज्यादा ध्यान दिया जिन्हें नीचे दिया गया है।
- औद्योगिक देशों में आर्थिक संतुलन को बरकरार रखना और पूर्ण रोजगार दिलवाना
- पूँजी, सामान और श्रमिकों के प्रवाह पर बाहरी दुनिया के प्रभाव को नियंत्रित करना
ब्रेटन वुड्स इंस्टिच्यूशन
1944 की जुलाई में अमेरिका के न्यू हैंपशायर के ब्रेटन वुड्स नामक जगह पर यूनाइटेड नेशंस मॉनिटरी ऐंड फिनांशियल कॉन्फ्रेंस हुआ। इस कॉन्फ्रेंस में इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड की स्थापना हुई। इस संस्था को सदस्य देशों के बाहरी नफे और नुकसान की देखभाल के लिये बनाया गया।
युद्ध के बाद के पुनर्निर्माण की फंडिंग के लिए इंटरनेशनल बैंक फॉर रिकंस्ट्रक्शन ऐंड डेवलपमेंट की स्थापना की गई। इसे वर्ल्ड बैंक के नाम से भी जाना जाता है। आइएमएफ और वर्ल्ड बैंक को ब्रेटन वुड्स इंस्टिच्यूशन भी कहा जाता है। इसलिए युद्ध के बाद की आर्थिक प्रणाली को ब्रेटन वुड्स सिस्टम भी कहा जाता है।
आइएमएफ और वर्ल्ड बैंक ने 1947 में अपना काम शुरु कर दिया। इन संस्थाओं में लिए जाने वाले निर्णय को पश्चिमी औद्योगिक शक्तियाँ कंट्रोल करती थीं। अहम मुद्दों पर तो अमेरिका का वीटो चलता था।
ब्रेटन वुड्स सिस्टम का आधार था विभिन्न मुद्राओं के लिए एक निर्धारित विनिमय दर। डॉलर की कीमत को सोने की कीमत से जोड़ा गया जिसमें एक आउंस सोने की कीमत थी 35 डॉलर। अन्य मुद्राओं को डॉलर के मुकाबले अलग-अलग निर्धारित दरों पर रखा गया।
युद्ध के बाद के शुरुआती साल
ब्रेटन वुड्स सिस्टम ने पश्चिम के औद्योगिक देशों और जापान में एक अप्रत्याशित आर्थिक विकास के युग की शुरुआत कर दी। 1950 से 1970 के बीच विश्व का व्यापार 8% की दर से बढ़ा और आमदनी लगभग 5% की दर से बढ़ी। ज्यादातर औद्योगिक देशों में बेरोजगारी 5% से भी कम थी। इससे पता चलता है कि इस अवधि में कितनी आर्थिक स्थिरता आई थी।
उपनिवेशों का अंत और आजादी
दूसरे विश्व युद्ध के दो दशकों के भीतर कई उपनिवेश आजाद हो गए और नए राष्ट्र के रूप में सामने आये। शोषण के एक लंबे इतिहास के कारण ये देश भारी आर्थिक संकट में थे। शुरुआती दौर में ब्रेटन वुड्स इंस्टिच्यूशन इस स्थिति में नहीं थे कि इन देशों की माँग को पूरा कर सकें। इस बीच यूरोप और जापान ने तेजी से तरक्की कर ली थी और ब्रेटन वुड्स इंस्टिच्यूशन से स्वतंत्र हो गये थे। 1950 के दशक के आखिर में आकर इन इंस्टिच्यूशन ने दुनिया के विकासशील देशों की ओर ध्यान देना शुरु किया।
ये संस्थाएँ पुरानी उपनिवेशी ताकतों के नियंत्रण में थी। इसलिए ज्यादातर विकासशील देशों पर अभी भी इस बात का खतरा था कि पुरानी उपनिवेशी ताकतें उनका शोषण कर सकती हैं। एक नए आर्थिक ढ़ाँचे की माँग रखने के लिए इन देशों ने G – 77 (77 देशों का समूह) बनाया। उनकी माँगें थीं; अपने प्राकृतिक संसाधनों पर सही मायने में नियंत्रण, कच्चे माल की सही कीमत और विकसित बाजारों में बेहतर पकड़।
ब्रेटन वुड्स का अंत और भूमंडलीकरण
1960 आते आते विदेशों में अधिक दखलअंदाजी करने के कारण अमेरिका की ताकत में कमी आने लगी थी। सोने की तुलना में डॉलर अपनी कीमत को बचा नहीं पा रहा था। इस तरह से निर्धारित विनिमय दर की प्रणाली समाप्त हुई और अस्थाई विनिमय दर की परिपाटी शुरु हुई।
1970 के दशक के मध्य के बाद से अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था कई मायने में बदल गई। पहले विकासशील देश किसी भी अंतर्राष्ट्रीय संस्था से वित्तीय सहायता की माँग कर सकते थे। लेकिन अब उन्हें पश्चिम के कॉमर्शियल बैंकों और प्राइवेट लेंडिंग संस्थाओं से कर्ज लेने के लिये बाध्य होना पड़ता था। इससे कई बार विकासशील देशों में कर्जे की समस्या, बेरोजगारी और गिरती आमदनी की समस्या खड़ी हो जाती थी। कई अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देशों को इस तरह की कठिनाइयों से गुजरना पड़ा।
1949 की क्रांति के बाद चीन बाकी दुनिया से अलग थलग था। अब चीन ने भी नई आर्थिक नीतियों को अपनाना शुरु कर दिया और विश्व की अर्थव्यवस्था के करीब आने लगा। कई पूर्वी यूरोपियन देशों में सोवियत स्टाइल की कम्यूनिज्म के पतन के बाद कई नए देश भी विश्व की नई अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन गये।
चीन, भारत, ब्राजील, फिलिपींस, मलेशिया, आदि देशों में पारिश्रमिक काफी कम थी। इसलिए कई बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ इन देशों को अपने उत्पाद बनाने के लिए इस्तेमाल करने लगीं। भारत बिजनेस प्रॉसेस आउटसोर्सिंग का एक महत्वपूर्ण हब बन गया। पिछले दो दशकों में कई विकासशील देशों ने तेजी से वृद्धि की है। भारत, चीन और ब्राजील इसके बेहतरीन उदाहरण हैं।
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NCERT Solution
प्रश्न:1 सत्रहवीं सदी से पहले होने वाले आदान प्रदान के दो उदाहरण दीजिए। एक उदाहरण एशिया से और एक उदाहरण अमेरिका महाद्वीपों के बारे में चुनें।
उत्तर: सत्रहवीं सदी से पहले होने वाले आदान प्रदान के दो उदाहरण निम्नलिखित हैं:
एशिया से उदाहरण: नूडल चीन से आया है और भारत, इटली और दुनिया के अन्य देशों तक पहुँचा है।
अमेरिका से उदाहरण: आलू अमेरिका से आया है और आयरलैंड तक पहुँचा।
प्रश्न:2 बताएँ कि पूर्व आधुनिक विश्व में बीमारियों के वैश्विक प्रसार ने अमेरिकी भूभागों के उपनिवेशीकरण में किस प्रकार मदद की।
उत्तर: सोलहवीं सदी के मध्य तक अमेरिका में पुर्तगाली और स्पैनिश उपनिवेशों की शुरुआत ठोस रूप से हो चुकी थी। लेकिन यह जीत हथियारों की बदौलत नहीं हुई बल्कि बीमारियों की वजह से हुई। यूरोप के लोग पहले ही चेचक से प्रभावित हो चुके थे इसलिए उनमे इस बीमारी से लड़ने की प्रतिरोधन क्षमता विकसित हो चुकी थी। लेकिन अमेरिकी लोग दुनिया के अन्य भागों से कटे हुए थे इसलिए उनमें इस बीमारी से लड़ने की प्रतिरोधन क्षमता नहीं थी। जब यूरोप के लोग अमेरिका पहुँचे तो अपने साथ इस बीमारी के रोगाणु भी लेकर आए। अमेरिका के कुछ हिस्सों में इस बीमारी ने पूरी आबादी को नष्ट कर दिया। इस प्रकार से यूरोपियन आसानी से अमेरिका पर कब्जा कर सके।
प्रश्न:3 निम्नलिखित के प्रभावों की व्याख्या करते हुए संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखें:
प्रश्न:a) कॉर्न लॉ के समाप्त करने के बारे में ब्रिटिश सरकार का फैसला।
उत्तर: कॉर्न लॉ समाप्त होने के निम्नलिखित प्रभाव पड़े:
- ब्रिटेन में उपजने वाले खाद्य पदार्थों के मुकाबले आयात होने वाले खाद्य पदार्थ सस्ते हो गये।
- इस कारण से जमीन का एक बड़ा हिस्सा कृषि से विहीन हो गया और लोग भारी संख्या में बेरोजगार हो गये। काम की तलाश में लोग बड़ी संख्या में शहरों की ओर पलायन करने लगे। कई लोग देश के बाहर भी पलायन कर गये।
- खाद्य पदार्थों की घटी हुई कीमतों के कारण ब्रिटेन में उनकी मांग तेजी से बढ़ी। इस माँग को पूरा करने के लिए पूर्वी यूरोप, अमेरिका, रूस और ऑस्ट्रेलिया में बड़े पैमाने पर जमीन को साफ किया गया ताकि खेती हो सके।
- खाद्यान्नों को बंदरगाहों तक ले जाने की जरूरत भी महसूस हुई। इसके लिए रेल लाइनें बिछाई गईं ताकि कृषि उत्पादन के क्षेत्रों को बंदरगाहों से जोड़ा जा सके। कृषि उत्पादन क्षेत्रों में नई आबादी भी बसने लगी। इन सब कामों के लिए लंदन जैसे वित्तीय केंद्रों से पूँजी का प्रवाह होने लगा।
प्रश्न:b) अफ्रीका में रिंडरपेस्ट का आना।
उत्तर: रिंडरपेस्ट का अफ्रिका में आगमन 1880 के दशक के आखिर में हुआ था। यह बीमारी उन घोड़ों के साथ आई थी जो ब्रिटिश एशिया से लाए गए थे। ऐसा उन इटैलियन सैनिकों की मदद के लिए किया गया था जो पूर्वी अफ्रिका में एरिट्रिया पर आक्रमण कर रहे थे। रिंडरपेस्ट पूरे अफ्रिका में किसी जंगल की आग की तरह फैल गई। 1892 आते आते यह बीमारी अफ्रिका के पश्चिमी तट तक पहुँच चुकी थी। इस दौरान रिंडरपेस्ट ने अफ्रिका के मवेशियों की आबादी का 90% हिस्सा साफ कर दिया।
अफ्रिकियों के लिए मवेशियों का नुकसान होने का मतलब था रोजी रोटी पर खतरा। अब उनके पास खानों और बागानों में मजदूरी करने के अलावा और कोई चारा नहीं था। इस तरह से मवेशियों की एक बीमारी ने यूरोपियन को अफ्रिका में अपना उपनिवेश फैलाने में मदद की।
प्रश्न:c) विश्वयुद्ध के कारण यूरोप में कामकाजी उम्र के पुरुषों की मौत।
उत्तर: पहले विश्व युद्ध ने पूरी दुनिया को कई मायनों में झकझोर कर रख दिया था। लगभग 90 लाख लोग मारे गए और 2 करोड़ लोग घायल हो गये।
मरने वाले या अपाहिज होने वालों में ज्यादातर लोग उस उम्र के थे जब आदमी आर्थिक उत्पादन करता है। इससे यूरोप में सक्षम शरीर वाले कामगारों की भारी कमी हो गई। परिवारों में कमाने वालों की संख्या कम हो जाने के कारण पूरे यूरोप में लोगों की आमदनी घट गई।
ज्यादातर पुरुषों को युद्ध में शामिल होने के लिए बाध्य होना पड़ा लिहाजा कारखानों में महिलाएँ काम करने लगीं। जो काम पारंपरिक रूप से पुरुषों के काम माने जाते थे उन्हें अब महिलाएँ कर रहीं थीं।
प्रश्न:d) भारतीय अर्थव्यवस्था पर महामंदी का प्रभाव।
उत्तर: आर्थिक मंदी से भारत की अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ा। 1928 से 1934 के बीच भारत का आयात और निर्यात घटकर आधा हो गया। इसी दौरान भारत में गेहूँ की कीमतों में 50% की कमी आई।
कृषि उत्पादों की घटती कीमतों के बावजूद सरकार किसानों से पहले दर पर ही लगान वसूलना चाहती थी। इस तरह से इस स्थिति में किसानों की हालत सबसे ज्यादा खराब थी। कई किसानों को अपनी जमापूँजी निकालना पड़ा और जमीन और जेवर भी बेचने पड़े। इस तरह से भारत महँगी धातुओं का निर्यातक बन गया।
भारत के शहरी क्षेत्रों में आर्थिक मंदी का उतना असर नहीं पड़ा। कीमतें घटने के कारण शहर में रहने वाले लोगों का जीवन पहले से आसान हो गया था। भारत के राष्ट्रवादी नेताओं के दवाब के कारण उद्योगों को अधिक संरक्षण मिलने लगा जिससे उद्योग में अधिक निवेश हुआ।
प्रश्न:e) बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा अपने उत्पादन को एशियाई देशों में स्थानांतरित करने का फैसला।
उत्तर: पिछले दो दशकों में कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने उत्पादन को एशियाई देशों में स्थानांतरित कर लिया है। इसका मुख्य कारण है इन देशों में कम मजदूरी दर का होना। इस नये प्रचलन के कारण भारत, चीन, ब्राजी, फिलिपींस और मलेशिया जैसे देशों में रोजगार के नये अवसर पैदा हुए हैं। इससे इन देशों के लोगों की आमदनी भी बढ़ी है और चीजों की माँग भी बढ़ी है। इसके परिणामस्वरूप भारत, चीन और जापान जैसे देश विश्व की प्रमुख आर्थिक शक्तियों के रूप में उभरे हैं।
प्रश्न:4 खाद्य उपाब्धता पर तकनीक के प्रभाव को दर्शाने के लिए इतिहास से दो उदाहरण दें।
उत्तर: रेल के प्रसार के कारण विभिन्न देशों से यूरोप तक खाद्यान्न पहुँचाना आसान हो गया। खाद्य पदार्थों के बड़े पैमाने पर ढ़ुलाई के कारण भोजन सस्ता और सुलभ हो गया। इससे यूरोप में खाना अच्छी क्वालिटी का हो गया और लोगों की जेब की पहुँच में आ गया।
स्टीम से चलने वाले जहाजों और रेफ्रिजरेशन टेक्नॉलोजी के कारण मीट को तैयार करके अमेरिका से यूरोप तक ले जाना संभव हो गया। अब ब्रिटेन के लोगों के लिए मीट सस्ता हो गया जिससे उनका खान पान बेहतर हो सका।
प्रश्न:5 ब्रेटन वुड्स समझौते का क्या अर्थ है।
उत्तर: 1944 की जुलाई में अमेरिका के न्यू हैंपशायर के ब्रेटन वुड्स नामक जगह पर यूनाइटेड नेशंस मॉनिटरी ऐंड फिनांशियल कॉन्फ्रेंस हुआ। इस कॉन्फ्रेंस में इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड की स्थापना हुई। आइएमएफ और वर्ल्ड बैंक को ब्रेटन वुड्स इंस्टिच्यूशन भी कहा जाता है।
प्रश्न:6 कल्पना कीजिए कि आप कैरीबियाई क्षेत्र में काम करने वाले गिरमिटिया मजदूर हैं। इस अध्यय में दिए गए विवरणों के आधार पर अपने हालात और अपनी भावनाओं का वर्णन करते हुए अपने परिवार के नाम एक पत्र लिखें।
उत्तर: इस चिट्ठी के कुछ अंश इस तरह से हो सकते हैं:
हमें लगातार कई घंटों तक काम करना पड़ता है जिससे कठिनाई होती है। हमें यहाँ से वापस जाने की इजाजत भी नहीं मिलती है। कोई थोड़ा भी विरोध करे तो उसके साथ लोग सख्ती से पेश आते हैं। हमलोगों ने इस जिंदगी से समझौता करना सीख लिया है और सारी तकलीफों के बीच खुशी के कुछ पल ढ़ूँढ़ ही लेते हैं। हमलोग होली और मुहर्रम मिलजुलकर मनाते हैं। हम नई नई चीजें पकाने की कोशिश भी करते हैं। हममें से कई तो अपने गाँव की बोली तक भूल चुके हैं।
प्रश्न:7 अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक विनिमयों में तीन तरह की गतियों या प्रवाहों की व्याख्या करें। तीनों प्रकार की गतियों के भारत और भारतीयों से संबंधित एक एक उदाहरण दें और उनके बारे में संक्षेप में लिखें।
उत्तर: अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक विनिमयों में तीन तरह के प्रवाह निम्नलिखित हैं:
व्यापार का आदान प्रदान: भारत सदियों से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का अभिन्न हिस्सा रहा है। अंग्रेजी शासन शुरु होने के पहले भारते के मसाले सुदूर देशों तक जाते थे और बाहर से जवाहरात यहाँ आते थे।
श्रम का आदान प्रदान: आधुनिक भारत से सॉफ्टवेयर के ज्ञाता अमेरिका में जाकर काम करते हैं।
पूँजी का आदान प्रदान: आयात और निर्यात के कारण पूँजी का प्रवाह दोनों दिशाओं में होता रहता है।
प्रश्न:8 महामंदी के कारणों की व्याख्या करें।
उत्तर: महामंदी के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
जरूरत से ज्यादा कृषि उत्पादन: 1920 के दशक में कृषि क्षेत्र में जरूरत से ज्यादा उत्पादन एक अहम समस्या थी। कृषि उत्पादों की अत्यधिक सप्लाई के कारण कीमतें गिर रही थीं। किसानों ने इसकी भरपाई के लिए और भी अधिक उत्पादन करना शुरु किया। इसके कारण बाजार में कृषि उत्पादों की बाढ़ आ गई; जिससे कीमतें और नीचे गिरीं। खरीददारों की कमी के कारण कृषि उत्पाद सड़ने लगे।
अमेरिका द्वारा कर्ज में कमी: कई यूरोपीय देश कर्जे के लिए अमेरिका पर बुरी तरह से निर्भर थे। लेकिन अमेरिका के साहूकार थोड़ी ही बात पर घबराहट दिखाने लगते थे। 1928 के शुरुआती छ: महीने में अमेरिका द्वारा दिये गये कर्ज की राशि थी 100 करोड़ डॉलर। लेकिन एक साल के भीतर यह राशि घटकर 24 करोड़ रह गई। अमेरिका द्वारा हाथ खींच लिए जाने के कारण कई देशों की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ा।
प्रश्न:9 जी-77 देशों से आप क्या समझते हैं? जी-77 को किस आधार पर ब्रेटन वुड्स की जुड़वाँ संतानों की प्रतिक्रिया कहा जा सकता है, व्याख्या करें।
उत्तर: ये संस्थाएँ पुरानी उपनिवेशी ताकतों के नियंत्रण में थी। इसलिए ज्यादातर विकासशील देशों पर अभी भी इस बात का खतरा था कि पुरानी उपनिवेशी ताकतें उनका शोषण कर सकती हैं। एक नए आर्थिक ढ़ाँचे की माँग रखने के लिए इन देशों ने G – 77 (77 देशों का समूह) बनाया। चूँकि इस संगठन का निर्माण उन देशों द्वारा किया गया था जो ब्रेटन वुड्स के संस्थापक देशों में से कुछ के गुलाम थे इसलिए जी-77 को ब्रेटन वुड्स की जुड़वा संतानों की प्रतिक्रिया कहा जा सकता है।
प्रश्न:1 सिल्क रूट का क्या मतलब है?
उत्तर: जो व्यापार मार्ग चीन को पश्चिमी देशों और अन्य देशों से जोड़ता था उसे सिल्क रूट कहते हैं। उस जमाने में कई सिल्क रूट थे। सिल्क रूट ईसा युग की शुरुआत के पहले से ही अस्तित्व में था और पंद्रहवीं सदी तक बरकरार था।
प्रश्न:2 किस तरह चेचक की बीमारी ने यूरोपीय लोगों के लिये अमेरिका में रास्ता आसान बना दिया?
उत्तर: चेचक की बीमारी ने यूरोप के लोगों पर पहले ही आक्रमण किया था। इसलिये यूरोप के लोगों के शरीर में इस बीमारी के खिलाफ प्रतिरोधन क्षमता विकसित हो चुकी थी। लेकिन तब तक अमेरिका दुनिया के अन्य भागों से अलग थलग था। इसलिये अमेरिकी लोगों के शरीर में चेचक से लड़ने के लिये प्रतिरोधन क्षमता विकसित नहीं हुई थी। जब यूरोप के लोग अमेरिका पहुँचे तो वे अपने साथ चेचक के जीवाणु भी ले गये। इससे अमेरिका के लोगों में चेचक की बीमारी फैलने लगी। इस बीमारी ने अमेरिका के कुछ भागों की पूरी आबादी साफ कर दी। इस तरह से यूरोपियन लोगों को अमेरिका पर आसानी से जीत हासिल हो गई।
प्रश्न:3 उन्नीसवीं सदी के आखिरी दशक तक किस तरह से कृषि क्षेत्र में एक वैश्विक अर्थव्यवस्था का निर्माण हो गया?
उत्तर: औद्योगीकरण के कारण ब्रिटेन में भोजन की माँग बढ़ने लगी थी। इस माँग को पूरा करने के लिये पूर्वी यूरोप, अमेरिका, रूस और ऑस्ट्रेलिया में जोर शोर से खेती होने लगी। कृषि कार्य में मजदूरों की माँग को पूरा करने के लिये लोगों का भारी संख्या में पलायन हुआ। रेल लाइनें बिछाकर खेतों को बंदरगाहों से जोड़ा गया। इस तरह से अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में उन्नीसवीं सदी के अंत तक कृषि क्षेत्र में एक वैश्विक अर्थव्यवस्था का निर्माण हो गया।
प्रश्न:4 उन्नीसवीं सदी की मुख्य तकनीकी खोजें क्या हैं? इन खोजों ने किस तरह से अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण में मदद की?
उत्तर: इस युग के कुछ मुख्य तकनीकी खोज हैं रेलवे, स्टीम शिप और टेलिग्राफ।
- रेलवे ने बंदरगाहों और आंतरिक भूभागों को आपस में जोड़ दिया।
- स्टीम शिप के कारण माल को भारी मात्रा में अतलांतिक के पार ले जाना आसान हो गया।
- टेलीग्राफ की मदद से संचार व्यवस्था में तेजी आई और इससे आर्थिक लेन देन बेहतर रूप से होने लगे।
प्रश्न:5 बंधुआ मजदूर से आप क्या समझते हैं?
उत्तर: वैसे मजदूर जो किसी खास मालिक के लिए किसी खास अवधि के लिए काम करने को प्रतिबद्ध होते हैं बंधुआ मजदूर कहलाते हैं।
प्रश्न:6 उन्नीसवीं सदी में औद्योगीकरण का भारतीय व्यापार पर क्या असर पड़ा?
उत्तर: भारत से उम्दा कॉटन के कपड़े वर्षों से यूरोप निर्यात हो रहे थे। लेकिन औद्योगीकरण के बाद स्थानीय उत्पादकों ने ब्रिटिश सरकार को भारत से आने वाले कॉटन के कपड़ों पर प्रतिबंध लगाने के लिए बाध्य किया। इससे ब्रिटेन में बने कपड़े भारत के बाजारों में भारी मात्रा में आने लगे। 1800 में भारत के निर्यात में 30% हिस्सा कॉटन के कपड़ों का था। 1815 में यह गिरकर 15% हो गया और 1870 आते आते यह 3% ही रह गया। लेकिन 1812 से 1871 तक कच्चे कॉटन का निर्यात 5% से बढ़कर 35% हो गया। इस दौरान निर्यात किए गए सामानों में नील (इंडिगो) में तेजी से बढ़ोतरी हुई। भारत से सबसे ज्यादा निर्यात होने वाला सामान था अफीम जो मुख्य रूप से चीन जाता था।
प्रश्न:7 आर्थिक मंदी का भारत के शहरों पर क्या असर पड़ा?
उत्तर: भारत के शहरी क्षेत्रों में आर्थिक मंदी का उतना असर नहीं पड़ा। कीमतें घटने के कारण शहर में रहने वाले लोगों का जीवन पहले से आसान हो गया था।
प्रश्न:8 आइएएफ और वर्ल्ड बैंक को ब्रेटन वुड्स इंस्टिच्यूशन क्यों कहते हैं?
उत्तर: दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1944 की जुलाई में अमेरिका के न्यू हैंपशायर के बेटन वुड्स नामक जगह पर यूनाइटेड नेशंस मॉनिटरी ऐंड फिनांशियल कॉन्फ्रेंस हुआ था। इस कॉन्फ्रेंस में इंटरनेशन मॉनिटरी फंड की स्थापना हुई। उसके बाद इंटरनेशनल बैंक फॉर रिकंस्ट्रक्शन ऐंड डेवलपमेंट की स्थापना हुई जिसे वर्ल्ड बैंक के नाम से भी जाना जाता है। इसलिये इन दो संस्थानों को ब्रेटन वुड्स इंस्टिच्यूशन भी कहते हैं।
☆END☆
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