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Friday, June 14, 2019

नागरिक शास्त्र-chapter-3.लोकतंत्र और विविधता

3.लोकतंत्र और विविधता

समाज में विविधता

किसी भी समाज में विविधता तभी आती है जब उस समाज में विभिन्न आर्थिक तबके, धार्मिक समुदायों, विभिन्न भाषाई समूहों, विभिन्न संस्कृतियों और जातियों के लोग रहते हैं।
भारत देश विविधताओं का एक जीता जागता उदाहरण है। इस देश में दुनिया के लगभग सभी मुख्य धर्मों के अनुयायी रहते हैं। यहाँ हजारों भाषाएँ बोली जाती हैं, अलग-अलग खान पान है, अलग-अलग पोशाक और तरह तरह की संस्कृति दिखाई देती है।

सामाजिक विभाजन और राजनीति:

आपने जीव विज्ञान की कक्षा में डार्विन के क्रमिक विकास के सिद्धांत के बारे में पढ़ा होगा। इस सिद्धांत के अनुसार जो सबसे फिट होता है वही जिंदा रह पाता है। मनुष्यों को अपना जीवन सही तरीके से जीने के लिए आर्थिक रूप से तरक्की करनी होती है। जब कोई व्यक्ति आर्थिक तरक्की कर लेता है तो उसे समाज में ऊँचा स्थान मिल जाता है। हर देश के इतिहास में यह देखने को मिलता है कि आर्थिक रूप से संपन्न समूह ने आर्थिक रूप से कमजोर समूह पर शासन किया है। इससे यह सुनिश्चित हो जाता था कि संसाधन और शक्ति के स्रोतों पर किसी खास समूह का एकाधिकार कायम हो सके।
सामाजिक विविधता का राजनीति पर परिणाम तीन बातों पर निर्भर करता है, जो निम्नलिखित हैं:
लोग अपनी सामाजिक पहचान को किस रूप में लेते हैं इससे सामाजिक विविधता का राजनीति पर परिणाम तय होता है। यदि किसी खास समूह के लोग अपने को विशिष्ट मानने लगते हैं तो फिर वे सामाजिक विविधता को गले नहीं उतार पाते हैं।

किसी समुदाय की मांगों को राजनेता द्वारा किस तरह से पेश किया जाता है।
यह इस पर भी निर्भर करता है कि किसी समुदाय की मांग पर सरकार की क्या प्रतिक्रिया होती है। यदि सरकार किसी समुदाय की मांग को उचित तरीके से मान लेती है तो फिर उस समुदाय की राजनीति सबल हो जाती है।
प्राचीन भारत में समाज को कार्य के आधार पर चार समूहों में बाँटा गया था। समय बीतने के साथ इन चार समूहों का स्थान जाति व्यवस्था ने ले लिया। जाति व्यवस्था में जन्म को ही किसी व्यक्ति के कर्म का आधार मान लिया जाता है। कुछ काम ऊँची जाति के लोग ही कर सकते हैं, जबकि कुछ काम केवल नीची जाति के लोगों के लिए तय होते हैं।
आजादी के कुछ वर्षों पहले तक सभी आर्थिक संसाधन ऊँची जाति के लोगों के हाथों में थे। इन लोगों ने नीची जाति के लोगों को दबाकर रखा था ताकि नीची जाति के लोग सामाजिक व्यवस्था में ऊपर न उठ सकें।
अंग्रेजी हुकूमत ने भारत में आधुनिक शिक्षा पद्धति की शुरुआत की थी। आजादी के बाद की सरकारों ने भी शिक्षा को बढ़ावा दिया। इससे पिछड़े वर्गों के लोग भी आधुनिक शिक्षा का लाभ उठाने लगे। मीडिया ने भी समाज में जागरूकता फैलाने का काम किया।
धीरे-धीरे समाज के पिछड़े वर्ग के लोगों में जागरूकता फैलने लगी। इसके दूरगामी परिणाम हुए हैं। आज लगभग हर क्षेत्र में नीची जाति के लोगों का प्रतिनिधित्व देखने को मिलता है। आज नीची जाति के लोग ऊँचे पदों पर आसीन दिखते हैं।
आज सरकारी तंत्र में समाज के लगभग हर वर्ग का प्रतिनिधित्व दिखाई देता है। इससे यह पता चलता है कि समाज के हर वर्ग को सत्ता में साझेदारी मिलने लगी है। भारत एक मजबूत लोकतंत्र बनने की दिशा में अग्रसर है।

हासिये पर खड़े लोगों को मुख्यधारा में जोड़ने के लिये सरकार के प्रयास:
आजादी के बाद संविधान में दो ऐसे अहम प्रावधान किये गये जो भारत को सही दिशा में ले जा सकें।
पहला प्रावधान था देश के हर वयस्क नागरिक को मताधिकार देना। उस जमाने में कई जानकारों ने इस बात की हँसी उड़ाई थी। उनका मानना था कि अशिक्षित लोगों में इतना विवेक नहीं हो सकता कि वे अपने मताधिकार का सही उपयोग कर पाएँ। लेकिन गांधीजी का मानना था कि यदि कोई आदमी इतना विवेकपूर्ण हो सकता है कि अपने परिवार का भरण-पोषण कर ले तो फिर उसमें सरकार चुनने लायक विवेक भी अवश्य ही होगा।
दूसरा प्रावधान था अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के लोगों को आरक्षण देना ताकि उन्हें राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ा जा सके। आज एक दलित का बेटा भी आइआईएम और आइआइटी जैसी शिक्षण संस्थानों से शिक्षा प्राप्त कर पाता है और भारतीय प्राशासनिक सेवा में कार्य कर पाता है। यह सब आरक्षण के कारण ही संभव हो पाया है।
इसका सही महत्व समझने के लिए हमें विश्व के अन्य देशों के उदाहरणों को देखना होगा। यूरोप के देशों में महिलाओं को मताधिकार मिलने में कई सौ साल लग गये थे। अमेरिका जैसे अति विकसित देश में भी आज तक कोई महिला राष्ट्रपति नहीं बन पाई है। बारक ओबामा से पहले तक कोई भी अश्वेत अमेरिका का राष्ट्रपति नहीं बन पाया था।
हमारे देश में लाखों समस्याओं के बावजूद अल्पसंख्य समुदाय और दलित समुदाय के लोग ऊँचे पदों पर पहुँच चुके हैं। भारत में महिला प्रधानमंत्री और महिला राष्ट्रपति भी बन चुकी हैं। भारत के राष्ट्रपति के पद पर सिख, मुसलमान और दलित भी आसीन हो चुके हैं। सिख समुदाय से एक व्यक्ति तो प्रधानमंत्री भी रह चुके हैं।



NCERT Solution

प्रश्न 1:सामाजिक विभाजनों की राजनीति के परिणाम तय करने वाले तीन कारकों की चर्चा करें।
उत्तर: सामाजिक विभाजनों की राजनीति के परिणाम तीन कारकों पर निर्भर करते हैं जो निम्नलिखित हैं:
यह इस बात पर निर्भर करता है कि लोग अपनी सामाजिक पहचान को किस रूप में लेते हैं। यदि लोग अपने आप को विशिष्ट मानने लगते हैं तो ऐसे में सामाजिक विविधता को पचा पाना मुश्किल हो जाता है।
राजनेता किसी समुदाय की मांगों को किस तरह से पेश करते हैं।
किसी समुदाय की मांग पर सरकार की कैसी प्रतिक्रिया होती है। यदि किसी समुदाय की मांग को सही तरीके से माना जाता है तो इससे राजनीति सबल बनती है।
प्रश्न 2:सामाजिक अंतर कब और कैसे सामाजिक विभाजनों का रूप ले लेते हैं?
उत्तर: जब सामाजिक अंतर से लोगों में विशेष होने की भावना भरने लगती है तो इससे सामाजिक विभाजन का जन्म होता है। भारत में पुराने समय से ही सभी संसाधनों पर ऊँची जाति के लोगों का नियंत्रण रहा है। इसके अलावा सवर्णों ने दलितों और पिछड़ी जाति के लोगों को आर्थिक विकास का फायदा उठाने से रोक कर रखा। इससे देश में सामाजिक विभाजन बढ़ता चला गया।
प्रश्न 3:सामाजिक विभाजन किस तरह से राजनीति को प्रभावित करते हैं? दो उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर: किसी भी देश की राजनीति वहाँ के सामाजिक विभाजन से अछूती नहीं रह सकती। राजनैतिक दल हमेशा ही किसी न किसी सामाजिक समुदाय का प्रतिनिधित्व करेंगे और उनकी आवाज को उठाएँगे। उदाहरण के लिए बहुजन समाज पार्टी को लीजिए। इस पार्टी के संस्थापकों ने दलितों के मुद्दों को उठाया और इस तरह से इस पार्टी का जन्म हुआ।
प्रश्न 4:................सामाजिक अंतर गहरे सामाजिक विभाजन और तनावों की स्थिति पैदा करते हैं। .............सामाजिक अंतर सामान्य तौर पर टकराव की स्थिति तक नहीं जाते।
उत्तर: सबको अलग करने वाला, सबको मिलाने वाला

प्रश्न 5:सामाजिक विभाजनों को सँभालने के संदर्भ में इनमे से कौन सा बयान लोकतांत्रिक व्यवस्था पर लागू नहीं होता?
  • लोकतंत्र में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के चलते सामाजिक विभाजनों की छाया राजनीति पर भी पड़ती है।
  • लोकतंत्र में विभिन्न समुदायों के लिए शांतिपूर्ण ढ़ंग से अपनी शिकायतें जाहिर करना संभव है।
  • लोकतंत्र सामाजिक विभाजनों को हल करने का सबसे अच्छा तरीका है।
  • लोकतंत्र सामाजिक विभाजनों के आधार पर समाज को विखंडन की ओर ले जाता है।
उत्तर: लोकतंत्र सामाजिक विभाजनों के आधार पर समाज को विखंडन की ओर ले जाता है।
प्रश्न 6:निम्नलिखित तीन बयानों पर विचार करें:
  • जहाँ सामाजिक अंतर एक दूसरे से टकराते हैं वहाँ सामाजिक विभाजन होता है।
  • यह संभव है कि एक व्यक्ति की कई पहचान हो।
  • सिर्फ भारत जैसे बड़े देशों में ही सामाजिक विभाजन होते हैं।
इन बयानों में से कौन कौन से बयान सही हैं।
उत्तर: a, b
प्रश्न 7:निम्नलिखित बयानों को तार्किक क्रम से लगाएँ।
  • सामाजिक विभाजन की सारी राजनीतिक अभिव्यक्तियाँ खतरनाक ही हों यह जरूरी नहीं है।
  • हर देश में किसी न किसी तरह के सामाजिक विभाजन रहते ही हैं।
  • राजनीतिक दल सामाजिक विभाजन के आधार पर राजनीतिक समर्थन जुटाने का प्रयास करते हैं।
  • कुछ सामाजिक अंतर सामाजिक विभाजनों का रूप ले सकते हैं।
उत्तर: d, b, c, a

प्रश्न 8:निम्नलिखित में किस देश को धार्मिक और जातीय पहचान के आधार पर विखंडन का सामना करना पड़ा? (बेल्जियम, भारत, यूगोस्लाविया, नीदरलैंड)
उत्तर: यूगोस्लाविया
प्रश्न 9:मार्टिन लूथर किंग जूनियर के 1963 के प्रसिद्ध भाषण के निम्नलिखित अंश को पढ़ें। वे किस सामाजिक विभाजन की बात कर रहे हैं? उनकी उम्मीदें और आशंकाएँ क्या-क्या थीं? क्या आप उनके बयानों और मैक्सिको ओलंपिक की उस घटना में कोई संबंध देखते हैं जिसका जिक्र इस अध्याय में था?
“मेरा एक सपना है कि मेरे चार नन्हें बच्चे एक दिन ऐसे मुल्क में रहेंगे जहाँ उन्हें चमड़ी के रंग के आधार पर नहीं, बल्कि उनके चरित्र के असल गुणों के आधार पर परखा जाएगा। स्वतंत्रता को उसके असली रूप में आने दीजिए। स्वतंत्रता तभी कैद से बाहर आ पाएगी जब यह हर बस्ती, हर गाँव तक पहुँचेगी, हर राज्य और हर शहर में होगी और हम उस दिन को ला पाएँगे जब ईश्वर की सारी संतानें – अश्वेत, स्त्री-पुरुष, गोरे लोग, यहूदी तथा गैर-यहूदी, प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक – हाथ में हाथ डालेंगी और इस पुरानी नीग्रो प्रार्थना को गाएँगी – ‘मिली आजादी, मिली आजादी! प्रभु बलिहारी, मिली आजादी!’ मेरा एक सपना है कि एक दिन यह देश उठ खड़ा होगा और अपने वास्तविक स्वभाव के अनुरूप कहेगा, “हम इस स्पष्ट सत्य को मानते हैं कि सभी लोग समान हैं।“
उत्तर: मार्टिन लूथर रंग के आधार पर होने वाले भेदभाव की बात कर रहे हैं। वह अश्वेत लोगों के खिलाफ पूर्वाग्रह के प्रति अपनी चिंता जता रहे हैं। वह ऐसे समाज की परिकल्पना करते हैं जहाँ सामाजिक विभाजन के आधार पर भेदभाव के लिए कोई जगह न हो। मैक्सिको ओलंपिक में अश्वेत द्वारा गोल्ड और ब्रॉन्ज मेडल जीतने के बाद ‘अश्वेत सलामी’ दी गई थी। जब टॉमी स्मिथ और जॉन कार्लोस नाम के दो अश्वेत एथलीट मेडल पोडियम पर खड़े थे और अमरीका राष्ट्रगान बज रहा था तो दोनों अथलीटों ने काले दस्ताने पहन कर सलामी दी थी। इस घटना ने अश्वेतों की हक की लड़ाई को एक नई ताकत दी थी। यह सलामी एक तरह से रंगभेद के खिलाफ सलामी थी।


Exta Questions Answers

प्रश्न 1:सामाजिक विविधता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर: किसी भी समाज में विविधता तभी आती है जब उस समाज में विभिन्न आर्थिक तबके, धार्मिक समुदायों, विभिन्न भाषाई समूहों, विभिन्न संस्कृतियों और जातियों के लोग रहते हैं।
प्रश्न 2:भारत एक विविधतापूर्ण देश है। स्पष्ट करें।
उत्तर: भारत देश विविधताओं का एक जीता जागता उदाहरण है। इस देश में दुनिया के लगभग सभी मुख्य धर्मों के अनुयायी रहते हैं। यहाँ हजारों भाषाएँ बोली जाती हैं, अलग-अलग खान पान है, अलग-अलग पोशाक और तरह तरह की संस्कृति दिखाई देती है।

प्रश्न 3:यदि किसी सामाजिक समूह के लोग अपने आप को विशिष्ट मानने लगें तो इसका क्या परिणाम होता है?
उत्तर: लोग अपनी सामाजिक पहचान को किस रूप में लेते हैं इससे सामाजिक विविधता का राजनीति पर परिणाम तय होता है। यदि किसी खास समूह के लोग अपने को विशिष्ट मानने लगते हैं तो फिर वे सामाजिक विविधता को गले नहीं उतार पाते हैं।
प्रश्न 4:किसी समुदाय की मांग पर सरकार की प्रतिक्रिया का राजनीति पर क्या असर होता है?
उत्तर: यह इस पर भी निर्भर करता है कि किसी समुदाय की मांग पर सरकार की क्या प्रतिक्रिया होती है। यदि सरकार किसी समुदाय की मांग को उचित तरीके से मान लेती है तो फिर उस समुदाय की राजनीति सबल हो जाती है।

प्रश्न 5:सरकारी नौकरियों में आरक्षण से क्या लाभ हुए हैं?
उत्तर: सरकारी नौकरियों में आरक्षण से कई लाभ हुए हैं। आज सरकारी तंत्र में समाज के लगभग हर वर्ग का प्रतिनिधित्व दिखाई देता है। इससे यह पता चलता है कि समाज के हर वर्ग को सत्ता में साझेदारी मिलने लगी है। भारत एक मजबूत लोकतंत्र बनने की दिशा में अग्रसर है।
प्रश्न 6:सामाजिक विविधता को उचित सम्मान देने के लिए संविधान में क्या प्रावधान किये गये?
उत्तर: सामाजिक विविधता को उचित सम्मान देने के लिए दो प्रावधान किये गये:
पहला प्रावधान था देश के हर वयस्क नागरिक को मताधिकार देना।
दूसरा प्रावधान था अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के लोगों को आरक्षण देना ताकि उन्हें राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ा जा सके।
☆END☆

Thursday, June 13, 2019

नागरिक शास्त्र-chapter-2.संघवाद

2.संघवाद

शासन की वह व्यवस्था जिसमें किसी देश की अवयव इकाइयों और एक केंद्रीय शक्ति के बीच सत्ता की साझेदारी हो उसे संघवाद कहते हैं। किसी भी संघीय व्यवस्था में सामान्य तौर पर सरकार के दो स्तर होते हैं। एक स्तर पर पूरे देश के लिये एक सरकार होती है और दूसरे स्तर पर राज्य की सरकारें होती हैं। केंद्रीय सरकार राष्ट्रीय महत्व के कुछ चुनिंदा विषयों के लिए जिम्मेवार होती है। राज्य सरकार उस राज्य के रोजमर्रा के प्रशासन के लिए जिम्मेवार होती है। दोनों स्तर की सरकारें अपना शासन चलाने के मामले में एक दूसरे से स्वतंत्र होती हैं।

भारतीय गणराज्य

हालांकि भारत के संविधान में ‘गणराज्य’ शब्द का उल्लेख नहीं है, लेकिन भारतीय राष्ट्र का निर्माण संघीय व्यवस्था पर हुआ था।
भारत के संविधान में मूल रूप से दो स्तर के शासन तंत्र का प्रावधान रखा गया था। एक स्तर पर केंद्रीय सरकार होती है जो भारतीय संघ का प्रतिनिधित्व करती है। दूसरे स्तर पर राज्य सरकारें होती हैं जो राज्यों का प्रतिनिधित्व करती हैं। बाद में इस व्यवस्था में एक तीसरे स्तर को जोड़ा गया, जो पंचायत और नगरपालिका के रूप में है।

संघीय व्यवस्था के मुख्य लक्षण:

इस प्रकार की शासन व्यवस्था में दो या दो से अधिक स्तर होते हैं।
शासन के विभिन्न स्तरों द्वारा नागरिकों के एक ही समूह पर शासन किया जाता है। हर स्तर का अधिकार क्षेत्र अलग होता है।
संविधान में सरकार के विभिन्न स्तरों के अधिकार क्षेत्रों के बारे में साफ साफ उल्लेख किया गया है। हर स्तर की सरकार का अस्तित्व और अधिकार क्षेत्र को संविधान से गारंटी मिली होती है।
संविधान के मूलभूत प्रावधानों को बदलना सरकार के किसी भी स्तर द्वारा अकेले संभव नहीं होता है। यदि ऐसे किसी बदलाव की जरूरत होती है तो इसके लिए सरकार के दोनों स्तरों की सहमति की आवश्यकता पड़ती है।

न्यायालय का यह अधिकार होता है कि वह संविधान का अर्थ निकाले और सरकार के विभिन्न स्तरों के कार्यों का व्याख्यान करे। जब कभी सरकार के विभिन्न स्तरों के बीच अधिकारों को लेकर कोई मतभेद होता है तो ऐसी स्थिति में सर्वोच्च न्यायालय का काम किसी अम्पायर की तरह होता है।
सरकार के हर स्तर के लिए वित्त के स्रोत का स्पष्ट विवरण दिया गया है। इससे विभिन्न स्तर के सरकारों की वित्तीय स्वायत्तता सुनिश्चित होती है।
संघीय ढ़ाँचे के दो उद्देश्य होते हैं। पहला उद्देश्य है देश की एकता को बल देना। दूसरा उद्देश्य है क्षेत्रीय विविधता को सम्मान देना।
किसी भी आदर्श संघीय व्यवस्था के दो पहलू होते हैं; पारस्परिक विश्वास और साथ रहने पर सहमति। ये दोनों पहलू संघीय व्यवस्था के गठन और कामकाज के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। सरकार के विभिन्न स्तरों के बीच सत्ता की साझेदारी के नियमों पर सहमति होना जरूरी होता है। विभिन्न स्तरों में परस्पर यह विश्वास भी होना चाहिए के वे अपने अपने अधिकार क्षेत्रों को मानेंगे और एक दूसरे के अधिकार क्षेत्रों में दखलंदाजी नहीं करेंगे।

सत्ता का संतुलन

अलग अलग संघीय ढ़ाँचे में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच सत्ता के संतुलन अलग अलग प्रकार के होते हैं। यह संतुलन उस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पर निर्भर करता है जिसपर उस संघ का निर्माण हुआ था।

संघों के निर्माण के दो तरीके हैं जो निम्नलिखित हैं:

सबको साथ लाकर संघ बनाना: इस प्रकार की व्यवस्था में स्वतंत्र राज्य स्वत: एक दूसरे से मिलकर एक संघ का निर्माण करते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है कि वैसे राज्य अपनी स्वायत्तता बनाये रखने के साथ साथ अपनी सुरक्षा बढ़ा सकें। इस प्रकार की व्यवस्था में केंद्र की तुलना में राज्यों के पास अधिक शक्ति होती है। इस प्रकार की संघीय व्यवस्था के उदाहरण हैं; संयुक्त राज्य अमेरिका, स्विट्जरलैंड और ऑस्ट्रेलिया।
सबको जोड़कर संघ बनाना: इस प्रकार की संघीय व्यवस्था में एक बहुत बड़ी विविधता वाले क्षेत्रों को एक साथ रखने के लिए सत्ता की साझेदारी होती है। इस प्रकार की व्यवस्था में राज्यों की तुलना में केंद्र अधिक शक्तिशाली होता है। हो सकता है कुछ इकाइयों को अन्यों के मुकाबले अधिक शक्ति मिली हुई हो। उदाहरण के लिए; भारत में जम्मू कश्मीर को अन्य राज्यों के मुकाबले अधिक शक्ति मिली हुई है। इस प्रकार की संघीय व्यवस्था के उदाहरण हैं: भारत, स्पेन, बेल्जियम, आदि।

विषयों की लिस्ट:

यूनियन लिस्ट: इस लिस्ट में राष्ट्रीय महत्व के विषय आते हैं। कुछ विषयों पर पूरे देश में एक जैसी नीति की जरूरत होती है, इसलिए उन्हें यूनियन लिस्ट में रखा जाता है। ऐसे विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास होता है। यूनियन लिस्ट के कुछ विषय हैं; देश की सुरक्षा, विदेश नीति, बैंकिंग, सूचना प्रसारण और मुद्रा।
स्टेट लिस्ट: जो विषय स्थानीय महत्व के होते हैं उन्हें स्टेट लिस्ट में रखा जाता है। ऐसे विषयों पर कानून बनाने का अधिकार राज्य के पास होता है। उदाहरण; पुलिस, व्यापार, वाणिज्य, कृषि और सिंचाई।
साझा लिस्ट: इस लिस्ट को कॉनकरेंट लिस्ट भी कहते हैं। वैसे विषय जो साझा महत्व के होते हैं, इस लिस्ट में आते हैं। साझा लिस्ट के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र और राज्य दोनों के पास होता है। यदि केंद्र और राज्य द्वारा बनाये गये नियमों में टकराव की स्थिति होती है तो केंद्र सरकार द्वारा बनाया गया कानून ही मान्य होता है। उदाहरण; शिक्षा, वन, ट्रेड यूनियन, विवाह, दत्तक अभिग्रहण, उत्तराधिकार, आदि।
बची हुई लिस्ट: वैसे विषय जो ऊपर दी गई किसी भी लिस्ट में न हो तो उन्हें बचे हुए विषयों की लिस्ट में रखा जाता है। ऐसे विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास होता है।
विशेष दर्जा: जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा दिया गया है। इस राज्य का अपना अलग संविधान है। भारत के संविधान के कई प्रावधान इस राज्य में तब तक लागू नहीं किये जा सकते जब तक कि उन्हें राज्य की विधान सभा की अनुमति न मिले। यदि कोई भारतीय इस राज्य का स्थाई नागरिक नहीं है तो वह इस राज्य में जमीन या मकान नहीं खरीद सकता है। कुछ अन्य राज्यों को भी विशेष राज्य का दर्जा दिया गया है।
केंद्र शासित प्रदेश: भारतीय गणराज्य की कुछ इकाइयों का क्षेत्रफल इतना कम है कि उन्हें एक राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता है। कुछ अन्य कारणों से इन्हें किसी अन्य राज्य में मिलाया भी नहीं जा सकता है। इन इकाइयों के पास बहुत ही कम शक्ति होती है। इन्हें केंद्र शाषित प्रदेश कहते हैं। ऐसे क्षेत्रों के प्रशासन के लिए केंद्र सरकार के पास विशेष अधिकार होते हैं। उदाहरण; दिल्ली, चंडीगढ़, अंडमान निकोबार, आदि।
भारत में सत्ता की साझेदारी की यह प्रणाली हमारे संविधान की मूलभूत संरचना में है। इस प्रणाली को बदलना बहुत कठिन है। अकेले संसद द्वारा यह संभव नहीं है। इस प्रणाली में कोई भी बदलाव लाने के लिए पहले तो उसे संसद के दोनों सदनों से दो तिहाई बहुमत से पास कराना होगा। उसके बाद कम से कम आधे राज्यों की विधान सभाओं से सहमति लेनी होगी।

भारत की संघीय व्यवस्था

भारत में संघीय व्यवस्था की सफलता के कारण
भाषायी राज्य: भारत एक विशाल देश है जहाँ अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं। इसके अलावा यहाँ भौगोलिक, जातीय, सांस्कृतिक, आदि विविधताएँ भी हैं। कुछ राज्यों का गठन भाषा के आधार पर किया गया ताकि एक ही भाषा बोलने वाले लोग एक ही राज्य में रह सकें। उदाहरण; तामिल नाडु, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, महाराष्ट्र, आदि। कुछ राज्यों का गठन भूगोल, जातीयता, संस्कृति आदि के आधार पर हुआ। उदाहरण; नागालैंड, उत्तराखंड, झारखंड, आदि।
भाषा नीति: भारत के संविधान में किसी भी भाषा को राष्ट्र भाषा का दर्जा नहीं दिया गया है। हिंदी को आधिकारिक भाषा की मान्यता दी गई है। लेकिन हिंदी केवल 40% लोगों की मातृभाषा है। इसलिए दूसरी भाषाओं की रक्षा करना अनिवार्य हो जाता है। इसके लिए कई प्रावधान बनाये गये। हिंदी के अलावा, 21 अन्य भाषाओं को अनुसूचित भाषा का दर्जा दिया गया है।
केंद्र और राज्य के रिश्ते: केंद्र और राज्य के बीच के रिश्तों के पुनर्गठन से हमारी संघीय व्यवस्था को और बल मिला है।

कांग्रेस की मोनोपॉली के समय:

आजादी के बाद एक लंबे समय तक भारत के अधिकांश हिस्सों में केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार हुआ करती थी। यह कांग्रेस की मोनोपॉली का दौर था। उस दौर में ऐसा अक्सर होता था जब केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकार के अधिकारों की अवहेलना की जाती थी। छोटी से छोटी बात पर किसी भी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाता था।

गठबंधन सरकार के दौर की स्थिति:

1989 के बाद कांग्रेस की मोनोपॉली का दौर समाप्त हुआ। उसके बाद केंद्र में गठबंधन सरकार का दौर शुरु हुआ। इससे राज्य सरकार की स्वायत्तता को अधिक सम्मान मिलने लगा और सत्ता में साझेदारी भी बढ़ी। इससे भारत में संघीय व्यवस्था को और अधिक बल मिला।

भारत में भाषायी विविधता:

1991 की जनगणना के अनुसार भारत में 1500 अलग-अलग भाषाएँ हैं। इन भाषाओं को कुछ मुख्य भाषाओं के समूह में रखा गया है। उदाहरण के लिये भोजपुरी, मगधी, बुंदेलखंडी, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी, भीली और कई अन्य भाषाओं को हिंदी के समूह में रखा गया है। विभिन्न भाषाओं के समूह बनाने के बाद भी भारत में 114 मुख्य भाषाएँ हैं। इनमें से 22 भाषाओं को संविधान के आठवें अनुच्छेद में अनुसूचित भाषाओं की लिस्ट में रखा गया है। अन्य भाषाओं को अ-अनुसूचित भाषा कहा जाता है। इस तरह से भाषाओं के मामले में भारत दुनिया का सबसे विविध देश है।

भारत में विकेंद्रीकरण:

भारत एक विशाल देश है, जहाँ दो स्तरों वाली सरकार से काम चलाना बहुत मुश्किल काम है। भारत के कुछ राज्य तो यूरोप के कई देशों से भी बड़े हैं। जनसंख्या के मामले में उत्तर प्रदेश तो रूस से भी बड़ा है। इस राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में बोली, खानपान और संस्कृति की विविधता देखने को मिलती है।
कई स्थानीय मुद्दे ऐसे होते हैं जिनका निपटारा स्थानीय स्तर पर ही क्या जा सकता है। स्थानीय सरकार के माध्यम से सरकारी तंत्र में लोगों की सीधी भागीदारी सुनिश्चित होती है। इसलिए भारत में सरकार के एक तीसरे स्तर को बनाने की जरूरत महसूस हुई।
1992 में विकेंद्रीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। संविधान में संशोधन किया गया ताकि लोकतंत्र के तीसरे स्तर को अधिक कुशल और शक्तिशाली बनाया जा सके। स्थानीय स्वशासी निकायों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया।
अब स्थानीय निकायों के नियमित चुनाव करवाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य हो गया है।
इन निकायों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ी जातियों के लिये सदस्यों और पदाधिकारियों के सीट रिजर्व होते हैं।
सभी सीटों का कम से कम एक तिहाई महिलाओं के लिये आरक्षित होता है।
पंचायत और म्यूनिसिपल के चुनावों को सुचारु रूप से करवाने के लिये हर राज्य में एक स्वतंत्र ‘राज्य चुनाव आयोग’ का गठन किया गया है।

पंचायती राज:

राज्य सरकारों को अपने राजस्व में से कुछ हिस्सा इन स्थानीय निकायों को देना होगा। यह हिस्सा अलग अलग राज्यों में अलग-अलग हो सकता है। ग्रामीण स्थानीय स्वशाषी निकाय को आम भाषा में पंचायती राज कहते हैं।
हर गाँव (कुछ राज्यों में गाँवों का एक समूह) में एक ग्राम पंचायत होती है। यह कई वार्ड सदस्य (पंच) का एक समूह होता है। पंचायत के अध्यक्ष को सरपंच कहते हैं।
पंचायत के सदस्यों का चुनाव उस पंचायत में रहने वाले वयस्कों द्वारा किया जाता है।
स्थानीय स्वशासी संरचना जिला के स्तर तक होती है।
पंचायत समिति: कुछ ग्राम पंचायतों को मिलाकर एक पंचायत समिति या प्रखंड या मंडल बनता है। इस मंडली के सदस्यों का चुनाव उस क्षेत्र के सभी पंचायतों के सदस्यों द्वारा किया जाता है।
जिला परिषद: एक जिले की सारी पंचायत समितियाँ मिलकर जिला परिषद का निर्माण करती हैं। जिला परिषद के अधिकतर सदस्य चुनकर आते हैं। उस जिले के लोक सभा के सदस्य, विधान सभा के सदस्य और जिला स्तर के अन्य निकायों के कुछ अधिकारी भी जिला परिषद के सदस्य होते हैं। जिला परिषद का राजनैतिक मुखिया जिला परिषद का अध्यक्ष होता है।
नगरपालिका: इसी तरह से शहरी क्षेत्रों में भी स्थानीय स्वशासी निकाय होती है। शहरों में नगरपालिका का गठन होता है। बड़े शहरों में म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन का गठन होता है। इनके सदस्य (वार्ड काउंसिलर) लोगों द्वारा चुने जाते हैं। फिर ये सदस्य अपने चेअरमैन का चुनाव करते हैं। म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन में इसे मेयर कहा जाता है।

NCERT Solution

प्रश्न 1: भारत की संघीय व्यवस्था में बेल्जियम से मिलती जुलती एक विशेषता और उससे अलग एक विशेषता को बताएँ।
उत्तर: बेल्जियम से मिलती जुलती विशेषता: सबको जोड़कर संघ बनाना।
बेल्जियम से अलग विशेषता: भारतीय संघ में राज्यों को कम स्वायत्तता मिली हुई है।
प्रश्न 2: शासन के संघीय और एकात्मक स्वरूपों में क्या-क्या मुख्य अंतर है? इसे उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट करें।
उत्तर: शासन के एकात्मक स्वरूप में केंद्र सरकार बहुत शक्तिशाली होती है और शासन के निचले स्तरों को सही मायने में शक्ति नहीं मिलती। इस तरह के उदाहरण कई तानाशाही शासनों और राजतंत्रों में देखे जा सकते हैं; जैसे लीबिया, सउदी अरब, आदि।
प्रश्न 3: 1992 के संविधान संशोधन के पहले और बाद के स्थानीय शासन के दो महत्वपूर्ण अंतरों को बताएँ।
उत्तर: 1992 के संविधान संशोधन के पहले स्थानीय शासन निकायों के पास संवैधानिक शक्ति नहीं होती थी। उस समय स्थानीय निकायों के चुनाव भी नियमित रूप से नहीं हो पाते थे। लेकिन 1992 के संशोधन के बाद चीजें बदल गई हैं।
प्रश्न 4: रिक्त स्थानों को भरें:
चूँकि अमरीका ............तरह का संघ है इसलिए वहाँ सभी इकाइयों को समान अधिकार है। संघीय सरकार के मुकाबले प्रांत ...........हैं। लेकिन भारत की संघीय प्रणाली .............की है और यहाँ कुछ राज्यों को औरों से ज्यादा शक्तियाँ प्राप्त हैं।
उत्तर: चूँकि अमरीका सबको साथ लाने वाले तरह का संघ है इसलिए वहाँ सभी इकाइयों को समान अधिकार है। संघीय सरकार के मुकाबले प्रांत अधिक शक्तिशाली हैं। लेकिन भारत की संघीय प्रणाली सबको जोड़ने की है और यहाँ कुछ राज्यों को औरों से ज्यादा शक्तियाँ प्राप्त हैं।

प्रश्न 5: भारत की भाषा नीति पर नीचे तीन प्रतिक्रियाएँ दी गई हैं। इनमें से आप जिसे ठीक समझते हैं उसके पक्ष में तर्क और उदाहरण दें।
संगीता: प्रमुख भाषाओं को समाहित करने की नीति ने राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया है।
अरमान: भाषा के आधार पर राज्यों के गठन ने हमें बाँट दिया है। हम इसी कारण अपनी भाषा के प्रति सचेत हो गए हैं।
हरीश: इस नीति ने अन्य भाषाओं के ऊपर अँगरेजी के प्रभुत्व को मजबूत करने भर का काम किया है।
उत्तर: संगीता का तर्क सबसे सही लगता है। भाषा का इस्तेमाल केवल एक दूसरे के साथ संवाद करने के लिये ही नहीं होता बल्कि भाषा उस संस्कृति और सभ्यता का अहम हिस्सा होती है जिसे विकसित होने में हजारों साल लगते हैं। लोगों का अपनी भाषा के साथ भावनात्मक जुड़ाव होता है। भारत की भाषा नीति लोगों में दूसरों की संस्कृति के लिए सम्मान जगाने की कोशिश है और इससे भारत की एकता को मजबूत करने में मदद मिली है।
प्रश्न 6: संघीय सरकार की एक विशिष्टता है:
  • राष्ट्रीय सरकार अपने कुछ अधिकार प्रांतीय सरकारों को देती है।
  • अधिकार विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच बँट जाते हैं।
  • निर्वाचित पदाधिकारी ही सरकार में सर्वोच्च ताकत का उपयोग करते हैं।
  • सरकार की शक्ति शासन के विभिन्न स्तरों के बीच बँट जाती है।
उत्तर: सरकार की शक्ति शासन के विभिन्न स्तरों के बीच बँट जाती है।
प्रश्न 7: भारतीय संविधान की विभिन्न सूचियों में दर्ज कुछ विषय यहाँ दिए गये हैं। इन्हें नीचे दी गई तालिका में संघीय सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची वाले समूहों में लिखें: रक्षा, पुलिस, कृषि, शिक्षा, बैंकिंग, वन, संचार, व्यापार, विवाह।
उत्तर:
12
1.संघीय सूचीरक्षा, बैंकिंग, संचार, विवाह
2.राज्य सूचीकृषि, पुलिस
3.समवर्ती सूचीशिक्षा, वन, व्यापार

प्रश्न 8: नीचे भारत में शासन के विभिन्न स्तरों और उनके कानून बनाने के अधिकार क्षेत्र के जोड़े दिए गये हैं। इनमें से कौन सा जोड़ा सही मेल वाला नहीं है?
12
a) राज्य सरकारराज्य सूची
b) केंद्र सरकारसंघीय सूची
c) केंद्र और राज्य सरकारसमवर्ती सूची
d) स्थानीय सरकारअवशिष्ट अधिकार
उत्तर: स्थानीय सरकार → अवशिष्ट अधिकार
प्रश्न 9:सुमेलित कीजिए:
सूची 1सूची 2
1. भारतीय संघa) प्रधानमंत्री
2. राज्यb) सरपंच
3. नगर निगमc) राज्यपाल
4. ग्राम पंचायतd) मेयर
उत्तर: 1- a, 2- c, 3- d, 4 - b
प्रश्न 10:नीचे दिये गये कथनों में से सही और गलत बताएँ:
  • संघीय व्यवस्था में संघ और प्रांतीय सरकारों के अधिकार स्पष्ट रूप से तय होते हैं।
  • भारत एक संघ है क्योंकि केंद्र और राज्य सरकारों के अधिकार संविधान में स्पष्ट रूप से दर्ज हैं और अपने-अपने विषयों पर उनका स्पष्ट अधिकार है।
  • श्रीलंका में संघीय व्यवस्था है क्योंकि उसे प्रांतों में बाँट दिया गया है।
  • भारत में संघीय व्यवस्था नहीं रही क्योंकि राज्यों कुछ अधिकार स्थानीय शासन की इकाइयों में बाँट दिये गये हैं।
उत्तर: a - सही, b - सही, c - सही, d - गलत

Extra Question Answer

प्रश्न 1:संघवाद किसे कहते हैं?
उत्तर: शासन की वह व्यवस्था जिसमें किसी देश की अवयव इकाइयों और एक केंद्रीय शक्ति के बीच सत्ता की साझेदारी हो उसे संघवाद कहते हैं।
प्रश्न 2:किसी भी संघीय व्यवस्था में सामान्य तौर पर सरकार के कितने स्तर होते हैं?
उत्तर: किसी भी संघीय व्यवस्था में सामान्य तौर पर सरकार के दो स्तर होते हैं। एक स्तर पर पूरे देश के लिये एक सरकार होती है और दूसरे स्तर पर राज्य की सरकारें होती हैं।
प्रश्न 3:संघीय व्यवस्था के मुख्य लक्षण क्या हैं?
उत्तर: संघीय व्यवस्था के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं:
इस प्रकार की शासन व्यवस्था में दो या दो से अधिक स्तर होते हैं।
शासन के विभिन्न स्तरों द्वारा नागरिकों के एक ही समूह पर शासन किया जाता है। हर स्तर का अधिकार क्षेत्र अलग होता है।
संविधान में सरकार के विभिन्न स्तरों के अधिकार क्षेत्रों के बारे में साफ साफ उल्लेख किया गया है। हर स्तर की सरकार का अस्तित्व और अधिकार क्षेत्र को संविधान से गारंटी मिली होती है।

प्रश्न 4:संघीय ढ़ाँचे के उद्देश्य क्या हैं?
उत्तर: संघीय ढ़ाँचे के दो उद्देश्य होते हैं। पहला उद्देश्य है देश की एकता को बल देना। दूसरा उद्देश्य है क्षेत्रीय विविधता को सम्मान देना।
प्रश्न 5:किसी आदर्श संघीय व्यवस्था के दो पहलू क्या हैं?
उत्तर: किसी भी आदर्श संघीय व्यवस्था के दो पहलू होते हैं; पारस्परिक विश्वास और साथ रहने पर सहमति।
प्रश्न 6:सबको साथ लाकर संघ बनाने से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: इस प्रकार की व्यवस्था में स्वतंत्र राज्य स्वत: एक दूसरे से मिलकर एक संघ का निर्माण करते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है कि वैसे राज्य अपनी स्वायत्तता बनाये रखने के साथ साथ अपनी सुरक्षा बढ़ा सकें। इस प्रकार की व्यवस्था में केंद्र की तुलना में राज्यों के पास अधिक शक्ति होती है। इस प्रकार की संघीय व्यवस्था के उदाहरण हैं; संयुक्त राज्य अमेरिका, स्विट्जरलैंड और ऑस्ट्रेलिया।
प्रश्न 7:सबको जोड़कर संघ बनाने से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: इस प्रकार की संघीय व्यवस्था में एक बहुत बड़ी विविधता वाले क्षेत्रों को एक साथ रखने के लिए सत्ता की साझेदारी होती है। इस प्रकार की व्यवस्था में राज्यों की तुलना में केंद्र अधिक शक्तिशाली होता है। हो सकता है कुछ इकाइयों को अन्यों के मुकाबले अधिक शक्ति मिली हुई हो। उदाहरण के लिए; भारत में जम्मू कश्मीर को अन्य राज्यों के मुकाबले अधिक शक्ति मिली हुई है। इस प्रकार की संघीय व्यवस्था के उदाहरण हैं: भारत, स्पेन, बेल्जियम, आदि।

प्रश्न 8:यूनियन लिस्ट से आप क्या समझते हैं?
उत्तर: इस लिस्ट में राष्ट्रीय महत्व के विषय आते हैं। कुछ विषयों पर पूरे देश में एक जैसी नीति की जरूरत होती है, इसलिए उन्हें यूनियन लिस्ट में रखा जाता है। ऐसे विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास होता है। यूनियन लिस्ट के कुछ विषय हैं; देश की सुरक्षा, विदेश नीति, बैंकिंग, सूचना प्रसारण और मुद्रा।
प्रश्न 9:स्टेट लिस्ट से आप क्या समझते हैं?
उत्तर: जो विषय स्थानीय महत्व के होते हैं उन्हें स्टेट लिस्ट में रखा जाता है। ऐसे विषयों पर कानून बनाने का अधिकार राज्य के पास होता है। उदाहरण; पुलिस, व्यापार, वाणिज्य, कृषि और सिंचाई।
प्रश्न 10:साझा लिस्ट से आप क्या समझते हैं?
उत्तर: इस लिस्ट को कॉनकरेंट लिस्ट भी कहते हैं। वैसे विषय जो साझा महत्व के होते हैं, इस लिस्ट में आते हैं। साझा लिस्ट के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र और राज्य दोनों के पास होता है। यदि केंद्र और राज्य द्वारा बनाये गये नियमों में टकराव की स्थिति होती है तो केंद्र सरकार द्वारा बनाया गया कानून ही मान्य होता है। उदाहरण; शिक्षा, वन, ट्रेड यूनियन, विवाह, दत्तक अभिग्रहण, उत्तराधिकार, आदि।
प्रश्न 11:केंद्र शासित प्रदेश का मतलब समझाएँ।
उत्तर: भारतीय गणराज्य की कुछ इकाइयों का क्षेत्रफल इतना कम है कि उन्हें एक राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता है। कुछ अन्य कारणों से इन्हें किसी अन्य राज्य में मिलाया भी नहीं जा सकता है। इन इकाइयों के पास बहुत ही कम शक्ति होती है। इन्हें केंद्र शाषित प्रदेश कहते हैं। ऐसे क्षेत्रों के प्रशासन के लिए केंद्र सरकार के पास विशेष अधिकार होते हैं। उदाहरण; दिल्ली, चंडीगढ़, अंडमान निकोबार, आदि।
☆END☆

नागरिक शास्त्र-chapter-1.सत्ता की साझेदारी

1.सत्ता की साझेदारी

जब किसी शासन व्यवस्था में हर सामाजिक समूह और समुदाय की भागीदारी सरकार में होती है तो इसे सत्ता की साझेदारी कहते हैं। लोकतंत्र का मूलमंत्र है सत्ता की साझेदारी। किसी भी लोकतांत्रिक सरकार में हर नागरिक का हिस्सा होता है। यह हिस्सा भागीदारी के द्वारा संभव हो पाता है। इस प्रकार की शासन व्यवस्था में नागरिकों को इस बात का अधिकार होता है कि शासन के तरीकों के बारे में उनसे सलाह ली जाये।

भारत में सत्ता की साझेदारी

भारत में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था है। यहाँ के नागरिक सीधे मताधिकार के माध्यम से अपने प्रतिनिधि को चुनते हैं। लोगों द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि एक सरकार को चुनते हैं। इस तरह से एक चुनी हुई सरकार रोजमर्रा का शासन चलाती है और नये नियम बनाती है या पुराने नियमों और कानूनों में संशोधन करती है।
किसी भी लोकतंत्र में हर प्रकार की राजनैतिक शक्ति का स्रोत प्रजा होती है। यह लोकतंत्र का एक मूलभूत सिद्धांत है। ऐसी शासन व्यवस्था में लोग स्वराज की संस्थाओं के माध्यम से अपने आप पर शासन करते हैं। एक समुचित लोकतांत्रिक सरकार में समाज के विविध समूहों और मतों को उचित सम्मान दिया जाता है। जन नीतियों के निर्माण में हर नागरिक की आवाज सुनी जाती है। इसलिए लोकतंत्र में यह जरूरी हो जाता है कि राजनैतिक सत्ता का बँटवारा अधिक से अधिक नागरिकों के बीच हो।

सत्ता की साझेदारी की आवश्यकता

समाज में सौहार्द्र और शांति बनाये रखने के लिये सत्ता की साझेदारी जरूरी है। इससे विभिन्न सामाजिक समूहों में टकराव को कम करने में मदद मिलती है।
किसी भी समाज में बहुसंख्यक के आतंक का खतरा बना रहता है। बहुसंख्यक का आतंक न केवल अल्पसंख्यक समूह को तबाह करता है बल्कि स्वयं को भी तबाह करता है। सत्ता की साझेदारी के माध्यम से बहुसंख्यक के आतंक से बचा जा सकता है।
लोगों की आवाज ही लोकतांत्रिक सरकार की नींव बनाती है। इसलिये यह कहा जा सकता है कि लोकतंत्र की आत्मा का सम्मान रखने के लिए सत्ता की साझेदारी जरूरी है।
सत्ता की साझेदारी के दो कारण होते हैं। एक है समझदारी भरा कारण और दूसरा है नैतिक कारण। सत्ता की साझेदारी का समझदारी भरा कारण है समाज में टकराव और बहुसंख्यक के आतंक को रोकना। सत्ता की साझेदारी का नैतिक कारण है लोकतंत्र की आत्मा को अक्षुण्ण रखना।

सत्ता की साझेदारी के रूप:

शासन के विभिन्न अंगों के बीच सत्ता का बँटवारा:

  • लोकतंत्र में शासन के विभिन्न अंगों के बीच सत्ता का बँटवारा होता है। उदाहरण के लिए; विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सत्ता का बँटवारा। इस प्रकार के बँटवारे में सत्ता के विभिन्न अंग एक ही स्तर पर रहकर अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हैं। इसलिए इस प्रकार के बँटवारे को क्षैतिज बँटवारा कहते हैं।
  • शासन के विभिन्न अंगों के बीच सत्ता के बँटवारे से यह सुनिश्चित हो जाता है कि शासन के किसी भी एक अंग के पास असीमित शक्ति न हो। यह विभिन्न संस्थानों के बीच शक्ति के संतुलन को सुनिश्चित करता है।
  • कार्यपालिका सत्ता का उपयोग करती है लेकिन वह संसद के अधीन होती है। संसद को कानून बनाने का अधिकार प्राप्त होता है लेकिन उसे जनता को जवाब देना होता है। न्यायपालिका इन दोनों से स्वतंत्र होती है। न्यायपालिका का काम होता है यह देखना कि विधायिका और कार्यपालिका सभी नियमों का सही ढ़ंग से पालन कर रही है या नहीं।

विभिन्न स्तरों पर सत्ता का बँटवारा:

भारत जैसे विशाल देश में सरकार चलाने के लिए यह जरूरी हो जाता है कि सत्ता का विकेंद्रीकरण हो। भारत सरकार को दो मुख्य स्तरों में बाँटा गया है; केंद्र सरकार और राज्य सरकार। केंद्र सरकार पर पूरे राष्ट्र की जिम्मेदारी होती है। गणराज्य की विभिन्न इकाइयों की जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर होती है। दोनों सरकारों के अधिकार क्षेत्र में अलग अलग विषय आते हैं। कुछ ऐसे विषय भी होते हैं जो साझा लिस्ट में रहते हैं और जिनपर राज्य और केंद्र सरकारों दोनों का अधिकार होता है।

सामाजिक समूहों के बीच सत्ता का बँटवारा:

भारत विविधताओं से भरा देश है। यहाँ अनेक सामाजिक, भाषाई और जातीय समूह हैं। इन विभिन्न समूहों के बीच भी सत्ता का बँटवारा होता है। समाज के पिछड़े वर्गों को आरक्षण दिया जाता है ताकि सरकारी तंत्र में उनका सही प्रतिनिधित्व हो सके। उदाहरण के लिए; अल्पसंख्यक समुदाय, अन्य पिछड़ी जातियों, अनुसूचित जाति और अनुसूचिक जनजाति के लोगों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण प्राप्त है।

विभिन्न प्रकार के दबाव समूहों के बीच सत्ता का बँटवारा:

  • सत्ता का बँटवारा विभिन्न राजनैतिक पार्टियों के बीच होता है। सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी या सबसे बड़े राजनैतिक गठबंधन को शासन करने का मौका मिलता है। बची हुई पार्टियाँ विपक्ष का निर्माण करती हैं। विपक्ष का काम होता है यह सुनिश्चित करना कि सत्तारूढ़ पार्टी लोगों की इच्छा के अनुसार काम करे। विभिन्न राजनैतिक पार्टियों के लोग विभिन्न कमेटियों के अध्यक्ष बनते हैं। यह राजनैतिक पार्टियो6 के बीच सत्ता की साझेदारी का एक अच्छा उदाहरण है।
  • राजनैतिक पार्टियों के अलावा देश में कई दबाव समूह होते हैं। उदाहरण के लिए; एसोचैम, छात्र संगठन, मजदूर यूनियन, आदि। ऐसे संगठनों के प्रतिनिधि कई नीति निर्धारक अंगों के भाग बनते हैं। इस तरह से दबाव समूहों को भी सत्ता में साझेदारी मिलती है।

NCERT Solution

प्रश्न 1: आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सत्ता की साझेदारी के अलग अलग तरीके क्या हैं? इनमें से प्रत्येक का एक उदाहरण भी दें।
उत्तर:आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सत्ता की साझेदारी के निम्न तरीके हैं”
  • सरकार विभिन्न अंगों के बीच सत्ता की साझेदारी: उदाहरण: विधायिका और कार्यपालिका के बीच सत्ता की साझेदारी।
  • सरकार के विभिन्न स्तरों में सत्ता की साझेदारी: उदाहरण: केंद्र और राज्य सरकारों के बीच सत्ता की साझेदारी।
  • सामाजिक समूहों के बीच सत्ता की साझेदारी: उदाहरण: सरकारी नौकरियों में पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिये आरक्षण।
  • दबाव समूहों के बीच सत्ता की साझेदारी: नये श्रम कानून के निर्माण के समय ट्रेड यूनियन के रिप्रेजेंटेटिव से सलाह लेना।
प्रश्न 2: भारतीय संदर्भ में सत्ता की हिस्सेदारी का एक उदाहरण देते हुए इसका एक युक्तिपरक और एक नैतिक कारण बताएँ।
उत्तर:युक्तिपरक कारण: सत्ता की साझेदारी से विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच टकराव कम करने में मदद मिलती है। इसलिये सामाजिक सौहार्द्र और शांति बनाए रखने के लिए सत्ता की साझेदारी जरूरी है। नैतिक कारण: लोकतंत्र की आत्मा को अक्षुण्ण रखना।
प्रश्न 3: इस अध्याय को पढ़ने के बाद तीन छात्रों ने अलग अलग निष्कर्ष निकाले। आप इनमें से किससे सहमत हैं और क्यों? अपना जवाब करीब 50 शब्दों में दें।
थम्मन: जिन समाजों में क्षेत्रीय, भाषायी और जातीय आधार पर विभाजन हो सिर्फ वहाँ सत्ता की साझेदारी जरूरी है।
मथाई: सत्ता की साझेदारी सिर्फ ऐसे बड़े देशों के लिए उपयुक्त है जहाँ क्षेत्रीय विभाजन मौजूद होते हैं।
औसेफ: हर समाज में सत्ता की साझेदारी की जरूरत होती है भली ही वह छोटा हो या उसमें सामाजिक विभाजन न हों।
उत्तर: मैं औसेफ से सहमत हूँ। हम जानते हैं कि लोकतंत्र की मूल भावना है लोगों के हाथ में सत्ता देना। सत्ता की साझेदारी करके हम लोकतंत्र की मूल भावना का सम्मान करते हैं। यदि सत्ता की साझेदारी नहीं होती है तो सत्ता कुछ चुनिंदा हाथों तक ही सीमित रह जाती है। ऐसी स्थिति से तानाशाही का जन्म होता है जिससे लोकतंत्र की हत्या हो जाती है।

प्रश्न 4: बेल्जियम में ब्रूसेल्स के निकट स्थित शहर मर्चटेम के मेयर ने अपने यहाँ के स्कूलों में फ्रेंच बोलने पर लगी रोक को सही बताया है। उन्होंने कहा कि इससे डच भाषा न बोलने वाले लोगों को इस फ्लेमिश शहर के लोगों से जुड़ने में मदद मिलेगी। क्या आपको लगता है कि यह फैसला बेल्जियम की सत्ता की साझेदारी व्यवस्था की मूल भावना से मेल खाता है? अपना जवाब करीब 50 शब्दों में लिखें।
उत्तर: बेल्जियम में सत्ता की साझेदारी के तहत डच भाषी और डच भाषा न बोलने वालों को बराबर की हिस्सेदारी दी गई है। ब्रूसेल्स की सरकार में फ्रेंच भाषी और डच भाषी लोगों में सत्ता का बराबर बँटवारा है। इससे पता चलता है कि दोनों समूहों में एक दूसरे के प्रति सम्मान की भावना है। इसलिये फ्रेंच भाषा वाले स्कूलों पर बैन लगाकर गलत किया है।
प्रश्न 5: नीचे दिए गए उद्धरण को गौर से पढ़ें और इसमें सत्ता की साझेदारी के जो युक्तिपकर कारण बताए गए हैं उसमें से किसी एक का चुनाव करें।
“महात्मा गांधी के सपनों को साकार करने और अपने संविधान निर्माताओं की उम्मीदों को पूरा करने के लिए हमें पंचायतों को अधिकार देने की जरूरत है। पंचायती राज ही वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना करता है। यह सत्ता उन लोगों के हाथों में सौंपता है जिनके हाथों में इसे होना चाहिए। भ्रष्टाचार कम करने और प्रशासनिक कुशलता को बढ़ाने का एक उपाय पंचायतों को अधिकार देना भी है। जब विकास की योजनाओं को बनाने और लागू करने में लोगों की भागीदारी होगी तो इन योजनाओं पर उनका नियंत्रण बढ़ेगा। इससे भ्रष्ट बिचौलियों को खत्म किया जा सकेगा। इस प्रकार पंचायती राज लोकतंत्र की नींव को मजबूत करेगा।“
उत्तर: इस उद्धरण में सरकार के विभिन्न स्तरों पर सत्ता की साझेदारी की बात की गई है जो सत्ता की साझेदारी का एक युक्तिपरक कारण है।
प्रश्न 6: सत्ता के बँटवारे के पक्ष और विपक्ष में कई तरह के तर्क दिए जाते हैं। इनमें से जो तर्क सत्ता के बँटवारे के पक्ष में हैं उनकी पहचान करें और नीचे दिए गए कोड से अपने उत्तर का चुनाव करें।
  • विभिन्न समुदायों के बीच टकराव को कम करती है।
  • पक्षपात का अंदेशा कम करती है।
  • निर्णय लेने की प्रक्रिया को अटका देती है।
  • विविधताओं को अपने में समेट लेती है।
  • अस्थिरता और आपसी फूट को बढ़ाती है।
  • सत्ता में लोगों की भागीदारी बढ़ाती है।
  • देश की एकता को कमजोर करती है।
उत्तर: a, b, d, f

प्रश्न 7: बेल्जियम और श्रीलंका की सत्ता में साझेदारी की व्यवस्था के बारे में निम्नलिखित बयानों पर विचार करें:
  • बेल्जियम में डच भाषी बहुसंख्यकों ने फ्रेंच भाषी अल्पसंख्यकों पर अपना प्रभुत्व जमाने का प्रयास किया।
  • सरकार की नीतियों ने सिंहली भाषी बहुसंख्यकों का प्रभुत्व बनाए रखने का प्रयास किया।
  • अपनी संस्कृति और भाषा को बचाने तथा शिक्षा और रोजगार में समान अवसर के लिए श्रीलंका के तमिलों ने सत्ता को संघीय ढ़ाँचे पर बाँटने की माँग की।
  • बेल्जियम में एकात्मक सरकार की जगह संघीय शासन व्यवस्था लाकर मुल्क को भाषा के आधार पर टूटने से बचा लिया गया।
ऊपर दिए गए बयानों में से कौन से सही हैं?
उत्तर: b, c और d
प्रश्न 8: निम्नलिखित को सुमेलित कीजिए
सूची 1सूची 2
1. सरकार के विभिन्न अंगों के बीच सत्ता का बँटवाराa) सामुदायिक सरकार
2. विभिन्न स्तर की सरकारों के बीच अधिकारों का बँटवाराb) अधिकारों का वितरण
3. विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच सत्ता की साझेदारीc) गठबंधन सरकार
4. दो या अधिक दलों के बीच सत्ता की साझेदारीd) संघीय सरकार
उत्तर: 1 - b, 2 - d, 3 - a, 4 - c
प्रश्न 9: सत्ता की साझेदारी के बारे में निम्नलिखित दो बयानों पर गौर करें और नीचे दिए प्रश्न का जवाब दे:
  • सत्ता की साझेदारी लोकतंत्र के लिए लाभकर है।
  • इससे सामाजिक समूहों में टकराव का अंदेशा घटता है।
इन बयानों में कौन सही है और कौन गलत?
उत्तर: दोनों बयान सही हैं।

Extra Questions Answers

प्रश्न 1: सत्ता की साझेदारी से आप क्या समझते हैं?
उत्तर: जब किसी शासन व्यवस्था में हर सामाजिक समूह और समुदाय की भागीदारी सरकार में होती है तो इसे सत्ता की साझेदारी कहते हैं।
प्रश्न 2: लोकतंत्र का मूलमंत्र क्या है?
उत्तर: सत्ता की साझेदारी

प्रश्न 3: भारत में सरकार का चुनाव कैसे होता है?
उत्तर: भारत के नागरिक सीधे मताधिकार के माध्यम से अपने प्रतिनिधि को चुनते हैं। लोगों द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि एक सरकार को चुनते हैं।
प्रश्न 4: भारत में चुनी हुई सरकार के मुख्य कार्य क्या होते हैं?
उत्तर: भारत में एक चुनी हुई सरकार रोजमर्रा का शासन चलाती है और नये नियम बनाती है या पुराने नियमों और कानूनों में संशोधन करती है।
प्रश्न 5: लोकतंत्र में यह क्यों आवश्यक होता है कि सत्ता का बँटवारा अधिक से अधिक लोगों के बीच हो?
उत्तर: किसी भी लोकतंत्र में हर प्रकार की राजनैतिक शक्ति का स्रोत प्रजा होती है। यह लोकतंत्र का एक मूलभूत सिद्धांत है। ऐसी शासन व्यवस्था में लोग स्वराज की संस्थाओं के माध्यम से अपने आप पर शासन करते हैं। एक समुचित लोकतांत्रिक सरकार में समाज के विविध समूहों और मतों को उचित सम्मान दिया जाता है। जन नीतियों के निर्माण में हर नागरिक की आवाज सुनी जाती है। इसलिए लोकतंत्र में यह जरूरी हो जाता है कि राजनैतिक सत्ता का बँटवारा अधिक से अधिक नागरिकों के बीच हो।
प्रश्न 6: समाज में सौहार्द्र और शांति बनाये रखने में सत्ता की साझेदारी की क्या भूमिका है?
उत्तर: सत्ता की साझेदारी से विभिन्न सामाजिक समूहों में टकराव को कम करने में मदद मिलती है।

प्रश्न 7: सत्ता की साझेदारी के दो कारण कौन कौन से हैं?
उत्तर: सत्ता की साझेदारी के दो कारण होते हैं। एक है समझदारी भरा कारण और दूसरा है नैतिक कारण।
प्रश्न 8: सत्ता की साझेदारी के मुख्य रूप क्या हैं?
उत्तर: सत्ता की साझेदारी के मुख्य रूप निम्नलिखित हैं:
  • शासन के विभिन्न अंगों के बीच सत्ता का बँटवारा
  • शासन के विभिन्न स्तरों पर सत्ता का बँटवारा
  • सामाजिक समूहों के बीच सत्ता का बँटवारा
  • विभिन्न प्रकार के दबाव समूहों के बीच सत्ता का बँटवारा
प्रश्न 9: न्यायपालिका का मुख्य कार्य क्या होता है?
उत्तर: न्यायपालिका का काम होता है यह देखना कि विधायिका और कार्यपालिका सभी नियमों का सही ढ़ंग से पालन कर रही है या नहीं।
प्रश्न 10: संसद का मुख्य काम क्या होता है?
उत्तर: नये कानून बनाना और पुराने कानूनों में संशोधन करना
☆END☆

अर्थशास्त्र-chapter-5.उपभोक्ता के अधिकार

5.उपभोक्ता के अधिकार

बाजार और उपभोक्ता

जब कोई उपभोक्ता किसी उत्पाद का इस्तेमाल करता है तो वह भी बाजार में भागीदार बन जाता है। उपभोक्ता के बगैर हम किसी कम्पनी के अस्तित्व के बारे में सोच भी नहीं सकते। उपभोक्ता के इतने महत्व के बावजूद उपभोक्ता को अपने समुचित अधिकार नहीं मिल पाते हैं। आपका पाला अक्सर ऐसे दुकानदारों से पड़ा होगा जो वजन करते समय बेईमानी करते हैं और कम तौलते हैं। बहुत सारे दुकानदार खाने के सामानों में मिलावट करते हैं। यदि आप कभी किसी दुकानदार से इसकी शिकायत करेंगे तो वह झगड़ा करने पर उतारू हो जायेगा।
ट्रेन में सफर करते समय तो ग्राहक की स्थिति और भी दयनीय हो जाती है। ट्रेन में हमेशा खाने पीने की घटिया चीजें मिलती हैं। ट्रेन की पैंट्री में जो खाना बेचा जाता है वह बहुत महंगा होता है और घटिया क्वालिटी का होता है।

भारत में उपभोक्ता आंदोलन:

भारत के व्यापारियों के बीच मिलावट, कालाबाजारी, जमाखोरी, कम वजन, आदि की परंपरा काफी पुरानी है। भारत में उपभोक्ता आंदोलन 1960 के दशक में शुरु हुए थे। 1970 के दशक तक इस तरह के आंदोलन केवल अखबारों में लेख लिखने और प्रदर्शनी लगाने तक ही सीमित होते थे। लेकिन हाल के वर्षों में इस आंदोलन में गति आई है।
लोग विक्रेताओं और सेवा प्रदाताओं से इतने अधिक असंतुष्ट हो गये थे कि उनके पास आंदोलन करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा था। एक लंबे संघर्ष के बाद सरकार ने भी उपभोक्ताओं की सुधि ली। इसके परिणामस्वरूप सरकार ने 1986 में कंज्यूमर प्रोटेक्शन ऐक्ट (कोपरा) को लागू किया।

उपभोक्ता के अधिकार

सूचना पाने का अधिकार: हर उपभोक्ता को यह अधिकार होता है कि उसे उत्पाद के बारे में सही जानकारी मिले। ऐसे कानून बन चुके हैं जिनके अनुसार उत्पाद के पैक पर अवयवों और सुरक्षा की जानकारी देना अनिवार्य है। सही सूचना उपभोक्ता को इस बात में मदद करती है कि वह किसी उत्पाद को खरीदने के लिये उचित निर्णय ले सके। किसी भी उत्पाद के पैक पर अधिकतम खुदरा मूल्य लिखना भी अनिवार्य हो गया है। यदि कोई दुकानदार एमआरपी से अधिक मूल्य लेता है तो उपभोक्ता इसकी शिकायत कर सकता है।
चयन का अधिकार: एक उपभोक्ता को यह अधिकार होना चाहिए कि उसके पास चुनने के लिये कई विकल्प हों। कोई भी विक्रेता किसी भी उत्पाद का केवल एक ही ब्रांड पेश नहीं कर सकता है। इससे मोनोपॉली की रोकथाम होती है।
क्षतिपूर्ति निवारण का अधिकार: अक्सर उत्पादक अपने उत्पादों के बारे में झूठे वादे करते हैं। कभी भी किसी उत्पाद में कोई त्रुटि भी हो सकती है। यदि किसी उपभोक्ता को इनके कारण कोई क्षति होती है तो उसे क्षतिपूर्तिनिवारण का अधिकार होता है। मान लीजिए कि किसी व्यक्ति ने एक स्कूटर खरीदा और पहले महीने में ही उस स्कूटर का इंजन काम करना बंद कर दे। ऐसी स्थिति में उपभोक्ता को यह अधिकार होता है कि बदले में उसके स्कूटर का इंजन मुफ्त में ठीक कराया जाये या इंजन को बदल दिया जाये।

कंज्यूमर फोरम:

भारत में उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिये स्थानीय स्तर पर कई संस्थाओं का गठन हुआ है। इन संस्थाओं को कंज्यूमर फोरम या कंज्यूमर प्रोटेक्शन काउंसिल कहते हैं। इन संस्थाओं का काम है किसी भी उपभोक्ता को कंज्यूमर कोर्ट में मुकदमा दायर करने में मार्गदर्शन करना। कई बार ऐसी संस्थाएँ कंज्यूमर कोर्ट में उपभोक्ता की तरफ से वकालत भी करती हैं। ऐसे संस्थानों को सरकार की तरफ से अनुदान भी दिया जाता है ताकि उपरोक्ता जागरूकता की दिशा में ठोस काम हो सके।
आजकल कई रिहायशी इलाकों में रेजिडेंट वेलफेअर एसोसियेशन होते हैं। यदि ऐसे किसी एसोसियेशन के किसी भी सदस्य को किसी विक्रेता या सर्विस प्रोवाइडर द्वारा ठगा गया हो तो ये उस सदस्य के लिये मुकदमा भी लड़ते हैं।

कंज्यूमर कोर्ट

यह एक अर्ध-न्यायिक व्यवस्था है जिसमें तीन लेयर होते हैं। इन स्तरों के नाम हैं जिला स्तर के कोर्ट, राज्य स्तर के कोर्ट और राष्ट्रीय स्तर के कोर्ट। 20 लाख रुपये तक के क्लेम वाले केस जिला स्तर के कोर्ट में सुनवाई के लिये जाते हैं। 20 लाख से 1 करोड़ रुपये तक के केस राज्य स्तर के कोर्ट में जाते हैं। 1 करोड़ से अधिक के क्लेम वाले केस राष्ट्रीय स्तर के कंज्यूमर कोर्ट में जाते हैं। यदि कोई केस जिला स्तर के कोर्ट द्वारा खारिज कर दिया जाता है तो उपभोक्ता को राज्य स्तर पर; और उसके बाद; राष्ट्रीय स्तर पर अपील करने का अधिकार होता है।

राष्ट्रीय कंज्यूमर दिवस

24 दिसंबर को राष्ट्रीय कंज्यूमर दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह वही दिन है जब भारतीय संसद ने कंज्यूमर प्रोटेक्शन ऐक्ट लागू किया था। भारत उन गिने चुने देशों में से है जहाँ उपभोक्ता की सुनवाई के लिये अलग से कोर्ट हैं। हाल के समय में उपभोक्ता आंदोलन ने भारत में अच्छी पैठ बनाई है। ताजा आँकड़ों के अनुसार भारत में 700 से अधिक कंज्यूमर ग्रुप हैं। उनमे से 20 – 25 अच्छी तरह से संगठित हैं और अपने काम के लिये जाने जाते हैं।
लेकिन उपभोक्ता की सुनवाई की प्रक्रिया जटिल, महंगी और लंबी होती जा रही है। वकीलों की ऊँची फीस के कारण अक्सर उपभोक्ता मुकदमे लड़ने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाता है।

NCERT Solution

प्रश्न 1: बाजार में नियमों तथा विनियमों की आवश्यकता क्यों पड़ती है? कुछ उदाहरणों के द्वारा समझाएँ।
उत्तर: नियमों तथा विनियमों की मदद से बाजार सही ढ़ंग से काम करता है। किसी भी व्यवसाय का मुख्य लक्ष्य होता है मुनाफे को अधिक से अधिक करना। नियम और कानून से यह सुनिश्चित किया जाता है कि मुनाफे के फेर में ग्राहक के जीवन स्तर से कोई समझौता न हो। हम अपने चारों ओर खाने की चीजों में मिलावट के कई उदाहरण देख सकते हैं। दूधवाला, मिठाईवाला, आदि अक्सर मिलावटी सामान बेचते हैं। सही नियम को लागू करके ही इस गलत आदत को रोका जा सकता है।
प्रश्न 2: भारत में उपभोक्ता आंदोलन की शुरुआत किन कारणों से हुई? इसके विकास के बारे में पता लगाएँ।
उत्तर: भारत के व्यवसायियों में गलत काम करने की पुरानी परंपरा रही है; जैसे मिलावट करना, जमाखोरी और कम वजन तौलना। 1960 के दशक से ही कई उपभोक्ता संघों का जन्म हुआ। उन्होंने जागरूकता अभियान चलाया और ग्राहकों की सुरक्षा के लिये लड़ाई लड़ी। इस लंबे संघर्ष के परिणामस्वरूप 1986 में कोपरा को लागू किया गया।
प्रश्न 3: दो उदाहरण देकर उपभोक्ता जागरूकता की जरूरत का वर्णन करें।
उत्तर: ज्यादातर लोग न्यूनतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) को देखने की जहमत भी नहीं उठाते और दुकानदार जितनी रकम माँगता है उतनी दे देते हैं। अपने पड़ोस के दुकानदार पर विश्वास करना एक अच्छी आदत हो सकती है लेकिन एमआरपी को चेक करना भी उतना ही जरूरी होता है। कई लोग तो दवा के पैक पर एक्सपायरी डेट भी नहीं देखते हैं। इससे मरीज की जान को खतरा हो सकता है। इन उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि उपभोक्ता में जागरूकता की जरूरत है।
प्रश्न 4: कुछ ऐसे कारकों की चर्चा करें, जिनसे उपभोक्ताओं का शोषण होता है?
उत्तर: उपभोक्ता के शोषण के कुछ कारक नीचे दिये गये हैं:
उपभोक्ता में जागरूकता की कमी व्यवसायी की लालच नियमों के पालन में ढ़िलाई उपभोक्ता शिकायत के मामलों के निबटारे में देरी

प्रश्न 5: उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम, 1986 के निर्माण की जरूरत क्यों पड़ी?
उत्तर: शोषण के खिलाफ उपभोक्ताओं की सुरक्षा के कारण ही कोपरा 1986 को लागू किया गया।
प्रश्न 6: अपने क्षेत्र के बाजार में जाने पर उपभोक्ता के रूप में अपने कुछ कर्तव्यों का वर्णन करें।
उत्तर: किसी शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में जाने से पहले मुझे वहाँ यह देखना चाहिए कि पार्किंग की सुविधा है या नहीं। मुझे वहाँ पर अग्निशामक यंत्रों की उपलब्धता के बारे में भी पता करना चाहिए। मुझे यह देखना चाहिए कि एक्सपायरी डेट के बाद वाला कोई उत्पाद शेल्फ पर तो नहीं रखा है। बिल अदा करने से पहले उसके सही होने की जाँच करनी चाहिए।
प्रश्न 7: मान लीजिए, आप शहद की एक बोतल और बिस्किट का एक पैकेट खरीदते हैं। खरीदते समय आप कौन सा लोगो या शब्द चिह्न देखेंगे और क्यों?
उत्तर: शहद की बोतल पर मैं एगमार्क का लोगो देखूँगा। इस निशान से यह पता चलता है कि शहद को पैक करने से पहले खाद्य पदार्थ से संबंधित सुरक्षा के नियमों का पालन किया गया था।
प्रश्न 8: भारत में उपभोक्ताओं को समर्थ बनाने के लिये सरकार द्वारा किन कानूनी मानदंडों को लागू करना चाहिए?
उत्तर: भारत में उपभोक्ताओं को समर्थ बनाने के लिये सरकार ने 1986 में कोपरा को लागू किया। उसके बाद भारत ने कई स्तरों पर उपभोक्ता कोर्ट की स्थापना की ताकि लोग अपनी शिकायत दर्ज करा सकें।
प्रश्न 9: उपभोक्ताओं के कुछ अधिकारों को बताएँ और प्रत्येक अधिकार पर कुछ पंक्तियाँ लिखें।
उत्तर: उपभोक्ता के कुछ अधिकार नीचे दिये गये हैं:
सूचना पाने का अधिकार: एक उपभोक्ता को किसी उत्पाद के बारे में सही जानकारी पाने का अधिकार होता है। अब ऐसे कानून हैं जो किसी उत्पाद के पैक पर अवयवों और सुरक्षा के बारे में जानकारी देना अनिवार्य बनाते हैं। चयन का अधिकार: एक उपभोक्ता को विभिन्न विकल्पों में से चुनने का अधिकार होता है। इस अधिकार को मोनोपॉली ट्रेड के खिलाफ बने कानूनों के जरिये लागू किया जाता है। क्षतिपूर्ति निवारण का अधिकार: यदि किसी उपभोक्ता को उत्पादक के झूठे वादों या उत्पादन की त्रुटियों के कारण कोई भी क्षति होती है तो उसे क्षतिपूर्ति निवारण का अधिकार होता है।
प्रश्न 10: उपभोक्ता अपनी एकजुटता का प्रदर्शन कैसे कर सकते हैं?
उत्तर: बाकी उपभोक्ताओं की मदद करने के लिये उपभोक्ता को किसी उपभोक्ता समूह का हिस्सा बन जाना चाहिए। कोई भी उपभोक्ता स्वयं ही उपभोक्ता जागरूकता के लिये कदम उठा सकता है। पोस्टर, संपादक के नाम पत्र, ब्लॉग लिखकर, आदि के द्वारा ऐसा किया जा सकता है।
प्रश्न 11: भारत में उपभोक्ता आंदोलन की प्रगति की समीक्षा करें।
उत्तर: विक्रेताओं द्वारा शोषण की परंपरा के खिलाफ लड़ने की इच्छा के कारण भारत में उपभोक्ता आंदोलन की शुरुआत हुई। पहले उपभोक्ता के हितों की रक्षा के लिये कोई कानून नहीं था। लगभग दो दशकों के संघर्ष के बाद ही सरकार ने उपभोक्ता अदालतों का गठन शुरु किया। अभी भी उपभोक्ता शिकायत के कई मामले लंबे समय तक लंबित रहते हैं। कोर्ट में किसी भी केस का फैसला आने में 20 से 30 वर्ष तक लग जाते हैं। अभी भी भारत में उपभोक्ता आंदोलन इतना शक्तिशाली नहीं हुआ है कि व्यवसायियों की ताकतवर लॉबी से मुकाबला कर सके। इसलिए अभी भी बहुत कुछ करने की जरूरत है।

प्रश्न 12: निम्नलिखित को सुमेलित करें:
1. एक उत्पाद के घटकों का विवरणa) सुरक्षा का अधिकार
2. एगमार्कb) उपभोक्ता मामलों में संबंध
3. स्कूटर में खराब इंजन के कारण हुई दुर्घटनाc) अनाजों और खाद्य तेल का प्रमाण
4. जिला उपभोक्ता अदालत विकसित करने वाली एजेंसीd) उपभोक्ता कल्याण संगठनों की अंतर्राष्ट्रीय संस्था
5. उपभोक्ता इंटरनेशनलe) सूचना का अधिकार
6. भारतीय मानक ब्यूरोf) वस्तुओं और सेवाओं के लिये मानक


उत्तर: 1 - e, 2 - c, 3 - a, 4 - b, 5 - d, 6 - f
प्रश्न 13: सही या गलत बताएँ
  • कोपरा केवल सामानों पर लागू होता है।
  • भारत विश्व के उन देशों में से एक है, जिसके पास उपभोक्ताओं की समस्याओं के निवारण के लिये विशिष्ट अदालतें हैं।
  • जब उपभोक्ता को ऐसा लगे कि उसका शोषण हुआ है, तो उसे जिला उपभोक्ता अदालत में निश्चित रूप से मुकदमा दायर करना चाहिए।
  • जब अधिक मूल्य का नुकसान हो, तभी उपभोक्ता अदालत में जाना लाभप्रद होता है।
  • हॉलमार्क, आभूषणों की गुणवत्ता बनाए रखने वाला प्रमाण है।
  • उपभोक्ता समस्याओं के निवारण की प्रक्रिया अत्यंत सरल और शीघ्र होती है।
  • उपभोक्ता को मुआवजा पाने का अधिकार है, जो क्षति की मात्रा पर निर्भर करती है।
उत्तर: 1 - गलत, 2 - सही, 3 - सही, 4 - गलत, 5 - सही, 6 - गलत, 7 - सही
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अर्थशास्त्र-chapter-4.वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था(b)

अर्थशास्त्र-chapter-4.वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था(b)

वैश्वीकरण के कारक:

1980 – 90 के दशक तक अधिकांश देश अपने बाजार को विश्व के बाजार से अलग थलग रखना पसंद करते थे। ऐसा इसलिए किया जाता था ताकि स्थानीय उद्योग धंधों को बढ़ावा मिल सके। इसके लिये भारी आयात शुल्क लगाया जाता था ताकि आयातित सामान महंगे हो जाएँ। इस तरह की नीतियों को ट्रेड बैरियर कहते हैं।
वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन ने अपने सदस्य देशों को इस बात के लिये सहमत कर लिया कि ट्रेड बैरियर घटाए जाएँ। वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन पूरी दुनिया में बेरोकटोक आर्थिक अवसर का पक्षधर रहा है। भारत भी इस संस्था का एक सदस्य है।

भारत सरकार ने 1991 में उदारवादी नीतियों की शुरुआत की। उसके बाद भारत में कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पदार्पण हुआ। आज उन उदारवादी नीतियों के परिणाम हर ओर दिखाई देते हैं। 1990 के पहले भारत में यदि किसी को कार खरीदना होता था तो दो ही विकल्प थे; एंबेसडर या प्रीमियर पद्मिनी। उसके लिये भी नम्बर लगाना होता था और नम्बर आने में दो साल से भी अधिक लगते थे। अब भारत के बाजार में विश्व की नामी गिरामी कम्पनियों की कारें उपलब्ध हैं और एक व्यक्ति जिस दिन चाहे उस दिन अपने पसंद की कार खरीद सकता है।

वैश्वीकरण के परिणाम:

रोजगार के बेहतर अवसर: वैश्वीकरण से आर्थिक गतिविधियों में तेजी आई है। नई नई कम्पनियों के आने से रोजगार के नये नये अवसर उत्पन्न हुए हैं। इसके कारण कई नये आर्थिक केंद्रों का विकास हुआ है, जैसे; गुड़गाँव, चंडीगढ़, पुणे, हैदराबाद, आदि।
जीवनशैली में बदलाव: वैश्वीकरण का प्रभाव लोगों की जीवनशैली पर भी पड़ा है। 1990 के पहले तक लोग दो जोड़ी पैंट शर्ट में गुजारा कर लेते थे। अब तो लोगों के पास हर मौके के लिये अलग अलग ड्रेस होते हैं। पहले जींस की पैंट बहुत कम लोगों के पास हुआ करती थी। अब अधिकांश लोग जींस की पैंट का इस्तेमाल करने लगे हैं। लोगों का खान पान भी बदल गया है। अब मैगी के नूडल्स इस तरह से खरीदे जाते हैं जैसे महीने का राशन खरीदा जाता हो।

विकास के असमान लाभ: वैश्वीकरण से आर्थिक असमानता भी तेजी से बढ़ी है। किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी में उँचे पद पर काम करने वाला व्यक्ति लाखों रुपये का वेतन लेता है। वहीं दूसरी ओर दिहाड़ी मजदूर को सरकार द्वारा निर्धारित मजदूरी भी नहीं मिल पाती है। आज भी हमारी जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जिसे दो जून की रोटी भी नसीब नहीं होती है।
विकसित देशों द्वारा गलत तरीकों का इस्तेमाल: विकसित देश आज भी ट्रेड बैरियर का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे अपने किसानों को भारी अनुदान देते हैं। विकासशील देशों को इसके बदले कुछ भी नहीं हासिल होता है।

सारांश:

वैश्वीकरण आधुनिक युग की ऐसी वास्तविकता है जिससे हम मुँह नहीं मोड़ सकते। वैश्वीकरण से यदि फायदे हुए हैं तो नुकसान भी हुए हैं। लेकिन नुकसान की तुलना में फायदे अधिक हुए हैं। अब जरूरत है ऐसी नीतियों की जिनसे वैश्वीकरण का लाभ जनमानस तक पहुँचे। जब हर तबके का आदमी एक निश्चित स्तर की जीवनशैली जीने लगेगा तभी वैश्वीकरण को सफल माना जायेगा।


NCERT Solution

प्रश्न:1 वैश्वीकरण से आप क्या समझते हैं? अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: आधुनिक काल में पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था जिस तरह आपस में जुड़ी हुई हैं उसे वैश्वीकरण या ग्लोबलाइजेशन कहते हैं। उदाहरण के लिये माइक्रोसॉफ्ट को लीजिए। माइक्रोसॉफ्ट का हेडक्वार्टर अमेरिका में है। इस कंपनी के सॉफ्टवेअर के कुछ अंश भारत और अन्य कई देशों में बनते हैं। माइक्रोसॉफ्ट के सॉफ्टवेअर पूरी दुनिया में इस्तेमाल किये जाते हैं।
प्रश्न:2 भारत सरकार द्वारा विदेश व्यापार एवं विदेशी निवेश पर अवरोधक लगाने के क्या कारण थे? इन अवरोधकों को सरकार क्यों हटाना चाहती थी?
उत्तर: जब भारत आजाद हुआ था तब यह एक गरीब देश था और यहाँ पर निजी पूँजी न के बराबर थी। उस समय स्थानीय उद्योग को संरक्षण की जरूरत थी ताकि वह पनप सके। इसलिए भारत में विदेश व्यापार एवं विदेशी निवेश पर अवरोधक लगाये गये थे। जब स्थितियों में सुधार हुआ और भारत एक अच्छे बाजार में बदल गया तब सरकार ने अवरोधकों को हटाने का निर्णय लिया।
प्रश्न:3 श्रम कानूनों में लचीलापन कंपनियों को कैसे मदद करेगा?
उत्तर: श्रम कानूनों में लचीलापन कंपनियों को श्रमिकों की संख्या पर नियंत्रण रखने में मदद करेगा। फिर कोई भी कम्पनी श्रमिकों की मौसमी माँग के हिसाब से नियोजन कर सकती है या उन्हें काम से हटा सकती है। कम माँग की स्थिति में किसी भी कम्पनी को अतिरिक्त श्रमिकों को ढ़ोने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। इससे कम्पनियों के मुनाफे में भी सुधार होगा।
प्रश्न:4 दूसरे देशों में बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ किस प्रकार उत्पादन या उत्पाद पर नियंत्रण स्थापित करती हैं?
उत्तर: दूसरे देशों में बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ कई तरीकों से उत्पादन या उत्पाद पर नियंत्रण स्थापित करती हैं। इनमे से कुछ नीचे दिये गये हैं:
  • कई MNC किसी स्थानीय कम्पनी से साझा वेंचर करते हैं ताकि उनका काम शुरु हो सके। स्थानीय कम्पनी को स्थानीय बाजार में व्यवसाय के माहौल के बारे में बेहतर पता होने की वजह से MNC को इससे मदद मिलती है। इसके अलावा स्थानीय कम्पनी का व्यवसाय का ढ़ाँचा पहले से ही जमा हुआ होता है।
  • जब बिजनेस एक निश्चित अनुपात में बढ़ जाता है तो MNC साझा समझौते को तोड़ देती है और फिर एक स्वतंत्र कम्पनी की तरह काम करती है। इससे उसे अपने बिजनेस पर बेहतर नियंत्रण हासिल करने में मदद मिलती है।
  • कुछ MNC पहले दिन से ही स्वतंत्र रूप से काम करना शुरु करती है।
  • कुछ MNC केवल स्थानीय बाजार के लिये उत्पादन करती है, वहीं कुछ अन्य निर्यात के लिये उत्पादन करती है।
प्रश्न:5 विकसित देश, विकासशील देशों से उनके व्यापार और निवेश का उदारीकरण क्यों चाहते हैं? क्या आप मानते हैं कि विकासशील देशों को भी बदले में ऐसी माँग करनी चाहिए?
उत्तर: विकसित देशों की कम्पनियाँ अक्सर दूसरे देशों में बिजनेस के लिये अनुकूल वातावरण बनाने के लिये अपनी सरकार पर दबाव डालती हैं। इसलिए विकसित देश, विकासशील देशों से उनके व्यापार और निवेश का उदारीकरण चाहते हैं। ऐसी स्थिति में विकासशील देशों को अपने लिये भी वैसी ही सुविधा की माँग करनी चाहिए।

प्रश्न:6 ‘वैश्वीकरण का प्रभाव एक समान नहीं है’। इस कथन की अपने शब्दों में व्याख्या कीजिए।
उत्तर: वैश्वीकरण से भारत में व्यापार करने के ढंग में और लोगों के रोजमर्रा के जीवन में बहुत बदलाव हुआ है, लेकिन अभी भी आबादी एक बहुत बड़े भाग तक इसका लाभ नहीं पहुँच पाया है। अमीर लोग और अधिक अमीर हो गये हैं, लेकिन गरीब लोग और अधिक गरीब हो गये हैं। बढ़ती हुई प्रतिस्पर्धा के कारण कई छोटे व्यवसायियों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण कई लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है। लेकिन ग्राहकों के पास अब बेहतर विकल्प हैं। इसलिए ऐसा कहा जा सकता है कि वैश्वीकरण का प्रभाव एक समान नहीं है।
प्रश्न:7 व्यापार और निवेश नीतियों का उदारीकरण वैश्वीकरण प्रक्रिया में कैसे सहायता पहुँचाती है?
उत्तर: व्यापार और निवेश नीतियों के उदारीकरण से वैश्वीकरण प्रक्रिया में बहुत सहायता मिली है। भारत में विदेशी निवेश में जबरदस्त वृद्धि हुई है। कई बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने भारत में अपना उत्पादन शुरु किया है और अपनी दुकान खोली है। बीपीओ का विस्तार हुआ है जिससे रोजगार के अवसरों में बढ़ोतरी हुई है। यह सब उदारीकरण के कारण ही संभव हो पाया है।
प्रश्न:8 विदेश व्यापार विभिन्न्न देशों के बाजारों के एकीकरण में किस प्रकार मदद करता है? यहाँ दिए गए उदाहरण से भिन्न उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए।
उत्तर: विदेश व्यापार से विश्व के विभिन्न बाजार आपस में जुड़ जाते हैं जिससे उनका एकीकरण होता है। इसे समझने के लिये मोबाइल फोन का उदाहरण लेते हैं। मोबाइल फोन बनाने वाली मुख्य कम्पनियाँ अमेरिका और यूरोप में हैं। इन देशों में उत्पाद का डिजाइन तैयार होता है। मोबाइल के अलग अलग पार्ट पूर्वी एशियाई देशों (मलेशिया, चीन और ताइवान) में बनते हैं और उन्हें चीन या भारत में एसेंबल किया जाता है। फिर अंतिम उत्पाद को पूरी दुनिया में बेचा जाता है। यह उदाहरण विश्व के कई बाजारों के एकीकरण को दर्शाता है।
प्रश्न:9 वैश्वीकरण भविष्य में जारी रहेगा। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि आज से बीस वर्ष बाद विश्व कैसा होगा? अपने उत्तर का कारण दीजिए।
उत्तर: आज से बीस साल बाद हम दुनिया के किसी भी कोने में स्थित कम्पनी को अपना ऑर्डर दे सकते हैं। इंटरने की सुविधा के कारण हम किसी भी उत्पाद को अपने अनुसार फेरबदल करके मंगवा सकते हैं। यातायात के तीव्र साधनों के कारण कोई भी उत्पाद दुनिया के किसी भी कोने तक कम से कम समय में डिलिवर किया जा सकेगा।
प्रश्न:10 मान लीजिए कि आप दो लोगों को तर्क करते हुए पाते हैं – एक कह रहा है कि वैश्वीकरण ने हमारे देश के विकास को क्षति पहुँचाई है, दूसरा कह रहा है कि वैश्वीकरण ने भारत के विकास में सहायता की है। इन लोगों को आप कैसे जवाब दोगे?
उत्तर: मुझे लगता है कि वैश्वीकरण से भारत के विकास में मदद मिली है। मेरे माता पिता बताते हैं मेरे जन्म से पहले टेलिफोन एक विलासिता की वस्तु हुआ करती थी। टेलिफोन कनेक्शन के लिये लोगों को वर्षों इंतजार करना पड़ता था। लोग एक दूसरे का हाल चाल जानने के लिये चिट्ठियों का आदान प्रदान करते थे जिसमें काफी समय लगता था। वैश्वीकरण के कारण भारत में मोबाइल फोन आ सका। मैं तो मोबाइल फोन के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता। मेरे मुहल्ले का सब्जी वाला भी मोबाइल फोन की मदद से अधिक बिजनेस कर पाता है।

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए:

दो दशक पहले की तुलना में भारतीय खरीददारों के पास वस्तुओं के अधिक विकल्प हैं। यह ................की प्रक्रिया से नजदीक से जुड़ा हुआ है। अनेक दूसरे देशों में उत्पादित वस्तुओं को भारत के बाजारों में बेचा जा रहा है। इसका अर्थ है कि अन्य देशों के साथ ..................बढ़ रहा है। इससे भी आगे भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा उत्पादित ब्रांडों की बढ़ती संख्या हम बाजारों में देखते हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भारत में निवेश कर रही हैं क्योंकि .................। जबकि बाजार में उपभोक्ताओं के लिए अधिक विकल्प इसलिए बढ़ते .............और ....................के प्रभाव का अर्थ है उत्पादकों के बीच अधिकतम ...............।
उत्तर: दो दशक पहले की तुलना में भारतीय खरीददारों के पास वस्तुओं के अधिक विकल्प हैं। यह वैश्वीकरण की प्रक्रिया से नजदीक से जुड़ा हुआ है। अनेक दूसरे देशों में उत्पादित वस्तुओं को भारत के बाजारों में बेचा जा रहा है। इसका अर्थ है कि अन्य देशों के साथ व्यापार बढ़ रहा है। इससे भी आगे भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा उत्पादित ब्रांडों की बढ़ती संख्या हम बाजारों में देखते हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भारत में निवेश कर रही हैं क्योंकि यह उनके लिये फायदेमंद है। जबकि बाजार में उपभोक्ताओं के लिए अधिक विकल्प इसलिए बढ़ते माँग और उम्मीदों के प्रभाव का अर्थ है उत्पादकों के बीच अधिकतम प्रतिस्पर्धा

निम्नलिखित को सुमेलित कीजिए:

1. बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ छोटे उत्पादकों से सस्ते दरों पर खरीदती हैं।a) मोटर गाड़ियाँ
2. आयात पर कर और कोटा का उपयोग, व्यापार नियमन के लिये किया जाता है।b) कपड़ा, जूते-चप्पल, खेल के सामान
3. विदेशों में निवेश करने वाली भारतीय कंपनियाँc) कॉल सेंटर
4. आई.टी. ने सेवाओं के उत्पादन के प्रसार में सहायता की है।d) टाटा मोटर्स, इंफोसिस, रैनबैक्सी
5. अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने उत्पादन करने के लिए निवेश किया है।e) व्यापार अवरोधक
उत्तर: 1 b, 2 e, 3 d, 4 c, 5 a

बहुवैकल्पिक प्रश्न:

प्रश्न:11 वैश्वीकरण के विगत दो दशकों में द्रुत आवागमन देखा गया है
  • देशों के बीच वस्तुओं, सेवाओं और लोगों का
  • देशों के बीच वस्तुओं, सेवाओं और निवेशों का
  • देशों के बीच वस्तुओं, निवेशों और लोगों का
उत्तर: देशों के बीच वस्तुओं, निवेशों और लोगों का
प्रश्न:12 विश्व के देशों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा निवेश का सबसे अधिक सामान्य मार्ग है
  • नये कारखानों की स्थापना
  • स्थानीय कंपनियों को खरीद लेना
  • स्थानीय कंपनियों से साझेदारी करना
उत्तर: स्थानीय कंपनियों से साझेदारी करना
प्रश्न:13 वैश्वीकरण ने जीवन स्तर के सुधार में सहायता पहुँचाई है।
  • सभी लोगों के
  • विकसित देशों के लोगों के
  • विकासशील देशों के श्रमिकों के
  • उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर: उपर्युक्त में से कोई नहीं

Extra Questions Answers

प्रश्न:1 वैश्वीकरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर: आधुनिक समय में पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था आपस में जुड़ी हुई है। विश्व की अर्थव्यवस्था के इस परस्पर जुड़ाव को वैश्वीकरण या ग्लोबलाइजेशन कहते हैं।
प्रश्न:2 सिल्क रूट क्या है?
उत्तर: चीन का रेशम जिस रास्ते से अरब और फिर पश्चिम के देशों और अन्य देशों में जाता था उस रास्ते को सिल्क रूट कहा जाता था।

प्रश्न:3 कोई कम्पनी अपने उत्पाद दुनिया के अलग-अलग देशों में क्यों बनवाती है? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर: हर कंपनी इस बात की पूरी कोशिश करती है कि उत्पादन के लागत को कम किया जाये। इसके लिये जरूरत पड़ने पर कंपनियाँ उत्पादन के कई चरणों को अलग-अलग देशों में पूरा करवाती हैं। यदि एप्पल नामक कंपनी अमेरिका में अपने उत्पाद बनाएगी तो वहाँ खर्च अधिक आयेगा क्योंकि अमेरिका में कामगारों को अधिक पारिश्रमिक देना होता है। यदि ताइवान या चीन में काम होगा तो खर्च कम आयेगा क्योंकि इन देशों में कामगारों को कम पारिश्रमिक देना होता है। कच्चे माल को हमेशा ऐसे स्थान से खरीदने की कोशिश की जाती है जहाँ वह सबसे सस्ते में उपलब्ध हो। इस तरह से विभिन्न देशों से काम करवाने में लागत कम की जा सकती है और मुनाफे को बढ़ाया जा सकता है।

प्रश्न:4 वैश्वीकरण ने किस तरह रोजगार के अवसर बढ़ाने में मदद की है?
उत्तर: वैश्वीकरण से आर्थिक गतिविधियों में तेजी आई है। नई नई कम्पनियों के आने से रोजगार के नये नये अवसर उत्पन्न हुए हैं। इसके कारण कई नये आर्थिक केंद्रों का विकास हुआ है, जैसे; गुड़गाँव, चंडीगढ़, पुणे, हैदराबाद, आदि।
प्रश्न:5 वैश्वीकरण से हमारी जीवनशैली पर क्या असर पड़ा है?
उत्तर: वैश्वीकरण का प्रभाव लोगों की जीवनशैली पर भी पड़ा है। 1990 के पहले तक लोग दो जोड़ी पैंट शर्ट में गुजारा कर लेते थे। अब तो लोगों के पास हर मौके के लिये अलग अलग ड्रेस होते हैं। पहले जींस की पैंट बहुत कम लोगों के पास हुआ करती थी। अब अधिकांश लोग जींस की पैंट का इस्तेमाल करने लगे हैं। लोगों का खान पान भी बदल गया है। अब मैगी के नूडल्स इस तरह से खरीदे जाते हैं जैसे महीने का राशन खरीदा जाता हो।
☆END☆